ek din zindagi ke naam..ek kahani


एक दिन ज़िन्दगी के नाम

दूर कहीं कोयल की कूक गोपी के कानों में पड़ी तो अपनी अलसाई अधखुली आँखों से , अंगडाई लेते हुए, उसने एक नज़र अपने चारों तरफ देखा और एक हलकी सी मुस्कराहट होंटों पे लिए चादर तान के फिर आँखें बंद कर लीं |

ठंडी हवा के झोके उसकी सर को सहलाते रहे और गोपी सपनों के पंख लगा मंद हवा के साथ एक अलग ही दुनिया में खो गया| आज उसे कोई जल्दी नहीं थी| ढाबे का मालिक एक दिन के लिए अपने घर गया था और आज का दिन केवल उसका था|

अचानक जैसे ही उसे ये ख्याल आया तो गोपी की सारी नींद हवा हो गयी.. पूरा दिन कोई काम नहीं ? ना बर्तन मांजना , ना लोगों को खाना परोसना , ना टेबल कुर्सियां पोंछना और ना गरम तंदूर और दहकते हुयी रसोई के साये में दिन बिताना | कुछ नहीं |

आखरी बार ऐसा कब हुआ था की उसके पास अपने लिए कुछ लम्हे थे ? शायद कई साल पहले जब बाबा और माँ जिंदा थे और वो पूरा दिन बाबा की गोदी में चढा रहता था या माँ के पास कंचे खेलता रहता था | शायद पॉँच बरस का था वो तब. फिर किस्मत ने करवट ली और सारा जीवन ही बदल गया| चचा उसे अपने साथ शहर ले आये और इस ढाबे वाले को बेच दिया | तीन सौ रूपए कीमत दी ढाबे के मालिक ने चचा को | लाडो का ब्याह जो करना था, एक एक पैसा जोड़ रहे थे वो फिर एक और बच्चे को कहाँ से खिलाते | चचा फिर कभी उसका हाल जानने नहीं आये |

गोपी ने कभी इस बात का दुःख नहीं मनाया की उसकी ज़िन्दगी को इतने सस्ते मी बेच दिया गया | हालाँकि यहाँ सुबह चार बजे से रात के दो बजे तक काम के सिवा कुछ नहीं था पर दो वक़्त की रोटी और सर पर छत तो थी |

एक लम्बी साँस लेकर गोपी ने चादर उतारी और झट से हैण्ड पम्प पर मुह धोने चला गया | थोडी ही देर में वो नहा धो कर तैयार था अपनी ज़िन्दगी का एक दिन अपनी ख़ुशी से जीने के लिए |

बटुए में से उसने कुछ पैसे निकाले और ठाठ से चाय वाले काका की दुकान पर चल दिया , आज उसने रसोई में ना घुसने की कसम खा ली थी | चाय नाश्ता करके उसने साहेब लोगों की तरह छोटू को एक रुपया थमाया और बोला ” रख ले तेरे लिए है “| छोटू ने भी हस्ते हुए दोस्त से रुपया लिया और अंटी में रख लिया

सारा दिन गोपी नदी किनारे और गन्ने के खेतों में घूमता रहा| हरीश बाबु के आम के बगीचे में से उसने कुछ आम तोडे और पूरी दोपहर आम के पेड़ के नीचे पैर पसार कर नीले आसमान को निहारता रहा|

कभी तितलियों के पीछे भागता तो कभी भूरी कुतिया के पिल्लों के साथ खेलता और वो भी एक नया दोस्त पाकर जैसे पगला से गए थे| गोपी ने जेब से पैसे निकाल कर गिने | कुछ दस रूपए थे , दौड़ कर वो फिर चाय की दुकान पर गया और एक थैली दूध और एक प्लेट ले आया और फिर खूब आनंद से सबको दूध पीते देखता रहा |

शाम ढलने लगी थी और चिडियाँ अपने घरों को लौटनी शुरू हो गयीं थी| चारों तरफ शोर ही शोर था | गोपी ने एक नज़र आम से लदे पेड़ों को देखा और धीरे धीरे वापस ढाबे की और चल पड़ा|

अचानक उसका मन् उदास हो गया | एक दिन जो उसने अपने ज़िन्दगी के नाम किया वो खोखला सा लगने लगा| सारे दिन पर नज़र डाली तो अपने जीवन के खालीपन का एहसास हुआ | एहसास हुआ उस अकेलेपन का जिसे वो ढाबे के शोर गुल और मालिक की गालियों के बीच भुला बैठा था | एहसास हुआ माँ और बाबा के ना होने का | यही सोचते सोचते उसकी आँखे और गला भर आये |

सुस्त क़दमों से अपने बोझिल मन् को लिए वो वापस ढाबे पर लौट आया| छोटू ने उसे मुह लटकाए आते देखा तो दूर से चिल्लाया ,” क्यूँ रे गोपी दिन भर कहाँ मस्ती मारता रहा और ऐसा सूजा मुह बना कर क्यूँ बैठा है? कोई मर गया क्या तेरा ?”

गोपी ने छोटू की हँसी और बात दोनों को अनसुना कर मुह फेर लिया और आँखों में भरे यादों के सागर को छलकने से रोकने का यतन करता रहा |

हाँ , उसने सोचा शायद कोई मर गया है | शायद मेरे अन्दर का वो बचपन मर गया है, शायद वो खुशियाँ जो मैंने अपने परिवार क साथ मनाईं थीं वो मर गयीं हैं, और शायद मेरे सारे सपने सारी उम्मीदें मर गयीं हैं |

ज़िन्दगी सिर्फ चूल्हे की आग में जलने के लिए बच गयी है| अब तो खुद के साथ समय बिताना भी कठिन हो गया है | शायद वो गोपी ही मर गया है और एक नए गोपी ने जन्म ले लिया है जिसका जीवन कोल्हू के बैल की तरह ढाबे की ज़िन्दगी के चारों तरफ घूमता है |

जेब से बचे पैसे निकाल गोपी ने वापस रख दिए| जितने उत्साह से वो इस दिन का इन्तेज़ार कर रहा था वो उसपर बहुत भारी पड़ने लगा था | अभी पूरी अँधेरी रात बाकी थी | सामने छाए की दुकान बंद हो गयो थी और छोटू अपने मालिक के साथ घर को निकल चुका था | कुछ दूर ,दुसरे ढाबे में आने जाने वालों का खूब शोर था और काम धड़ल्ले से हो रहा था|

गोपी ने कपडे बदले और सामने पेड के नीचे बिछी चारपाई पर लेट आसमान को देखता रहा | एक्का दुक्का तारे निकलने लगे थे | चाँद भी धीरे धीरे बादलों में से लिकल रहा था | ये भी मेरी तरह अकेला है गोपी ने सोचा| पूरी रात भटकता रहता है | पर खुद के दुख छुपा कर हम लोगों को कितना सूकून देता है | कल मालिक आ जायेगा , फिर लोग आयेंगे , ढाबे में रौनक छा जायेगी | शायद कोई ट्रक ड्राईवर फिर मेरे लिए कुछ सामान ले आये | फिर नए लोगों से मिलना होगा और ज़िन्दगी फिर पटरी पर चल पड़ेगी यही सोचते सोचते वो ना जाने कब सो गया |

ठंडी हवा ने मुस्कुराकर हलके से उसके सर को सहलाना शुरू कर दिया और चाँद मखमली बादलों में छिप गया ताकि वो आराम से सो सके | आखिर ये उसकी ज़िन्दगी की एक अकेली सुकून भरी रात थी , जहाँ केवल वो था , उसके सपने थे , उम्मीदें थीं और कुछ नहीं था |