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वो सराब था के हकीकत
मालूम नहीं
मेरा जुनून था या के कोई ख्वाब
मालूम नहीं

सेहरा की तपती रेत पर थे
उसके क़दमों के निशां
और फलक पर आंच थी उसकी
एक खुशबू सी हवा में थी
दिल में एक याद थी उसकी

अश्कों की तरह बह निकली थी रेत
उठ्ठा दर्द का था एक गुबार
पाँव अंगार हुए थे फिर भी
उसके दीदार का था इन्तेज़ार

दश्त दर दश्त सफ़र करके
आ पहुचे थे उस तक
और फिर ओझल हुआ
आखों से तसव्वुर उसका

है उम्मीद के बरसेगा कोई अब्र
लिए उसकी चाहत की भीनी सी फुहार
और कर जायेगा मुझे
उसके इश्क की बारिश से
फिर इक बार सराबोर
और दे जायेगा यकीन
उसके होने का

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