एक शहर ये भी – कविता 3 – दिल्ली में बसंत


                                                          

 

दिल्ली में बसंत तो हर साल आता है

पर इस बार बहुत सालों बाद 

हमारे आँगन की अमराई महकी है

उसी रंग उसी गंध में सराबोर

वो सड़क जो तुम तक पहुँचती थी

नीम की बौर से ढकी है और कुछ दूर

चटख नारंगी सेमल धधक रहा है

तुम्हारे घर की दीवार से सटे टेसू ने यादें

फिर रंग दीं हैं और मन फिर उन्ही

महुआ की रातों में घुल गया है

वहीँ लोदी गार्डन में जहाँ मेरा फेवरेट बेंच

कचनार की गुलाबी महक में डूबा हुआ है

वहीँ दबे पाँव जाने कब उस गुलाबी बोगनविला ने

डक पोंड के पास वाले तुम्हारे पसंदीदा बेंच को

क्लाद मोने की पेंटिंग में बदल दिया है 

दिल्ली में बसंत बिलकुल तुम्हारे प्यार जैसा है –

क्षणिक  – अविस्मरणीय

khud se judne ka ek naya prayas


आज यूँही बैठे ख़याल आया की क्यूँ ना एक हिंदी भाषा का सेक्शन शुरू करें | कुछ नगमे, कुछ गीत, कुछ जीवन के धागे में पिरोये मोती लफ्जों के रूप में पन्नों में बिखेरें जाएँ | जो रस , जो कशिश एस भाषा में है वो शायद कहीं नहीं| उर्दू शायरी , नज्मे और कुछ बेहतर लेख और कहानियां, ये सभी इस् सेक्शन का हिस्सा होंगे |

चलिए बिस्मिल्लाह करते हैं ग़ालिब साहेब की एक नज़्म से और उनके साथ मेरे do और पसंदीदा शायर और कवी फैज़ अहेमद फैज़ और गुलज़ार साहेब|

लफ्जों के जो मिठास इनकी लेखनी से निकली है वो कम ही पढने को मिलती है |

ये मेरे उन सभी दोस्तों के लिए है जिन्हें हिंदी और उर्दू भाषा से बेइंतेहा प्यार है ..मेरी तरह

लुत्फ़ उठायें

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो के ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंदख़ू क्या है

ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसे
वगर्ना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अद क्या है

चिपक रहा है बदन पर् लहू से पैराहन
हमारी जेब को अन हाजत-ए-रफ़ू क्या है

जला हैं जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो चार
ये शीशा-ओ-क़दाह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है

बना है शाह का मुसाहिब्, फिरे है इतराता
वरना शहर में “ग़ालिब” की आबरू क्या है

फैज़ साहेब से कुछ पुराना रिश्ता है| बचपन मी जब बाबा ने उर्दू शायरी से पहली बारा हमारी मुलाक़ात कराइ तो हमें फैज़ भा गए हालाँकि फिराक साहेब का जोर ज्यादा था फिर भी इनके नज्मों और ग़ज़लों मी जो उतार चढाव थे उन्होंने हमें बंधी रक्खा है अब तक

तुम आये हो – फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तुम आये हो तो शबे-इन्तज़ार गुज़री है
तलाश में है सहर, बार-बार गुज़री है

जुनूं मे जितनी भी गुज़री बकार गुज़री है
अगरचे दिल पे खराबी हज़ार गुज़री है

हुई है हज़्रते-नासेह से गुफ्तगू जिस शब
वो शब ज़रूर सरे-कू-ए-यार गुज़री है

वो बात सारे फसाने मे जिसका ज़िक्र न था
वो बात उनको बहुत नगवार गुज़री है

न गुल खिले, ना उनसे मिले, न मै पी है
अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है

चमन पे ग़ारते-गुलची से जाने क्या गुज़री
क़फस से आज सबा बेक़रार गुज़री है

गुलज़ार साहेब मेरे दिल के बहुत करीब हैं | इनकी रचनाओं ने मेरे लेखन पर एक गहरे चाप छोड़ी है| भावनाओं की जो गहरायी गुलज़ार साहेब की नज्मों मी मिलाती है वो सीधे दिल और रूह में उतर जाती है | शायद एक ब्लोग उनको नज़र करना ही होगा तभी कुछ बात बनेगी पर अभी मेरी प्रिय नज़्म उनके खजाने से

नज़्म उलझी हुई है सीने में

नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी