Phir Intezar


आज फिर शाख से सुनहरे पत्तों को
ज़मीं पर बरसते देखा
फिर तेरी याद के साये में
एक दिन को गुज़रते देखा
हवाओं की सरसराहट में सुनी फिर
तेरे गीतों की धुन

और फिर शाम के गहराते सायों में
गम की एक बद्ली सी उठी
आज फिर तेरे प्यार की तुषार से
भीगा मेरा मन्

पिघलते आसमा के स्पर्श से
मचल उठ्ठी जब सागर की लहरें
कुछ मेरे दिल में भी बीती हुई
रुपहली रंगीं रातों का तूफान उठा

फ़िज़ाओं में ऐ चाँद
तू क्यूँ है आज इतना गमगीन
सितारों की इस भीड़ में
क्या तू भी है मेरी तरह तनहा
क्यूँ आज तेरी चांदनी में
गम की नमी सी है
आज फिर यूँही नहाकर
तेरे अश्कों के समन्दर में
सोचती हूँ कि होगा क्या ये इन्तेज़ार ख़त्म
या फिर ऐ चाँद तेरी ही तरह
मुझको भी इक तन्हा मुसाफिर बनके
प्यार की राहों में युहीं दिन रात
भटकना होगा

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Intezar


 

फीर हुईं अश्क से नम् आँखें मेरी
फीर उठा दर्द आज सीने में
फीर तेरी याद सीने से लगाये
ढूढ़ते रहे हम तुझे शाम के
बेनूर अंधेरों में

तनहा थी मैं जब तक
तुम ना मीलेे थे
फीर तुम मिले , गम मीले ,
और इक कारवां सा बन गया

ओस से भीगी है रात कि अश्कों से
कर रहें हैं हम इन्तेज़ार बरसों से
सी लियें है लब तुने क्या जाने हम
वजह क्या है
इतनी ऊँची हैं दीवारें जो तुमने
बनायीं है हमारे बीच
वर्ना जान लेते थे हम सबब उदासी का
सिर्फ नज़रों से

बढालो फासले , मौन की ओढ़ लो चादर
बंद करदो सारे ज़रिये , सारे रस्ते
जो तुम तक पहुँचते हैं
मगर तुम देखना मेरी जां
तुम जिंतना दूर जाओगे
उनते ही करीब आओगे

ना जी सकोगे तुम ये हमें है पता
कर लो सारे जतन मुझे मालूम है
गर है मेरी मोहब्बत मी दम
एक दिन तुम लौट के ज़रूर आओगे

lamhe : shaam aur raat


 

शाम

आज शाम कुछ सायों से मुलाक़ात हूई
शायद पुरानी यादें थी, साथ हो लीं
पेड़ों के झुरमुट में पत्तो की सरसराहट ने
हौले से कुछ कहा

दूर पहाड़ी पे मंदिर के
घंटे की आवाज़
और बसेरों पे लौटते हुए
पंछियों का कोलाहल

खामोश रास्तों पर कुछ पहचाने से लम्हे
तेरे दीदार के इन्तेज़ार में नज़रें बिछाये
सूनी स्याह राहों को टाक रहे थे

नम आखों से भीगी हुयी पलकों पर
कुछ बूँदें छलक कर ठहर गयी थीं

जब शाम के गहराते साए
रात की काली चादर में घुलने लगे
और मैं मीलों फैली खामोशी साथ लिए
लौट आई तुम्हारे इन्तेज़ार के पल गिनने

रात

दिल की देहलीज़ पर हुयी दस्तक
सोचा तुम आये
सितारों ने हैरां होकर पुछा
क्या आज भी इन्तेज़ार है उसका ?

मैंने कहा इन्तेज़ार की तो अब आदत सी
हो गयी है
अब तो उनसे ज्यादा लगता है
उनकी यादों से मोहब्बत सी हो गयी है

मुझको यकीं है वो ना आया तो उसकी
यादों का कारवां तो आएगा
मिलन की खुशबू भरी सौगात ना सही
कुछ पुराने दर्द तो दे ही जायेगा

रात ये इन्तेज़ार की युहं ही निकल जायेगी
ये यकीं है हमको एस तटों भरी रात की
सुबह ज़रूर आएगी

मिलन होगा ये वादा था उसका
कभी मसरूफियत में अचानक
उसको जब हमारी यद् आएगी
बस वही पल है जिसकी आस में
हम पलकें बिछाये बैठे हैं
अब आयगा कोई पैगाम
ये आस लगाये बैठे हैं

यूँ ना समझना के उनको हमसे मोहब्बत ही नहीं
या के शायद अब उन्हें मेरी ज़रुरत ही नहीं
ये रिश्ता जो हम दोनों का है
रूहानी है
पहचान आज की नहीं
कई सदियों पुरानी है

कोई शिकवा नहीं उनसे
हर घड़ी के इस इन्तेज़ार का
नहीं होता इससे बढ़कर मज़ा प्यार का

रात बीत गयी पर इश्क की सुबह ज़रूर हूई, पैगाम आया वो आये और इन्तेज़ार की घड़ी ख़त्म हुयी

Lamhe..subah aur dopahar


Picture 193

भोर

कुछ आधे अधूरे ख्वाब
अपनी अलसाई आँखों मी समेटे
सूरज की पहली किरणों की चादर ओढे हुए
बिस्तर की सिलवटों में है
एक जिस्म करवटें ले रहा
तकिये पे शाम के बादलों के साए हैं
लिपटे हुए
नर्म गुलाबी होंठ जैसे ओस से भीगे गुलाब
और गालों पे लालिमा भोर के आकाश सी
हाथों की उँगलियाँ थामे है
डोर रेशमी प्रेम की
और पैरों में झनक
उठते हैं सैकडों स्वर,
जब शरमाकर वो तलवे
आपस में हैं मिलते इठलाकर
लेकर अंगडाई उतरती है ज़मी पर
फिर तुम्हरी मृण्मयी
मिलन की आस दामन में छुपाये


दोपहर

हो चली दोपहरी
अब भी बुन रही है ख्वाब हो
है आस अब भी कि
आएगा कोई संदेसा
पूछती है खुद से
आखीर उनका ये प्रेम है कैसा
उँगलियों में उलझी लटों को
बांधती, विरह से नम
झील सी आँखों से है ताकती
एक चुप्पी सी है शाखों पे
परिंदे खामोश हैं
थम गयी है हवा
थम सा गया है सब जहाँ
पर कहीं भीतर है उठने वाला
इक तूफां
बहुत उमस है,
शायद अब बरसेगा आसमां
लेके आयेंगीं घटायें
मन् में छिपे दुख का सावन
बहुत बरसेंगे ये नयन
लगता शाम ढले

शाम ढल रही है अब देखें क्या होता है ..रात युही गुज़रती है या कोई खबर आती है