लॉक डाउन डायरी 1- कुछ धुआं कुछ बादल


कई दिनों से ये व्यथा थी की हिंदी रोमन में लिखी जाये या देवनागरी में| लगभग सभी ने कहा देवनागरी ही उचित है सो मैंने ब्लॉग के स्वरूप इत्यादि की भी कुछ जाँच की| शायद मुझे हिंदी का एक नया ब्लॉग चलना पड़े जो मैं पहले भी सोच रही थी| ब्लॉग के हिंदी पाठको से अनुरोध है की वो कृपया बायें उन्हें कैसे पढ़ना सुविधाजनक है |

जब अपने बार में कुछ न हो तो अपने को शब्दों के सुपुर्द कर दो | आजकल अंग्रेजी में केवल वही लिखने का मन करता है जिसको हिंदी में लिख गुज़ारा नहीं होगा | हिंदी मेरे मन की भाषा है केवल इसलिए कि यही भाषा मैंने बचपन से बोली, लिखी, पढ़ी। इसमें कोई गौरव, कोई हीनता या कोई श्रेष्ठता का बोध नहीं है। ये मेरे रोज़मर्रा के जीवन की भाषा है इसलिए सहज है| मैं अक्सर हिंदुस्तानी या बोलचाल की भाषा में लिखते हूँ| साहित्यिक हिंदी का उपयोग बहुत सीमित है क्यूंकि अक्सर पढ़ने वालों को दिक्कत होती है| मैं अपने लेखन को सहज रखना चाह्ती हूँ| शुद्ध हिंदी का दायरा मुझे सीमित लगता है पर आम सरल बोलचाल की हिंदी उर्दू मिश्रित भाषा सबको समझ आ जाती है | ये शायद देहलवी या हिंदवी है या यूँ कहिये दिल्ली की भाषा है |

मूलतः अंग्रेजी में लिखने वालों को हिंदी लेखन के क्षेत्र में अपनी जगह बना कठिन हैं पर कोशिश रहेगी कि लिखती रहूं और साथ बना रहे |

सनद रहे कि बलपूर्वक थोपी गयी भाषा अपनी मिठास खो देती है | ये सभी भाषाओँ पे लागु होता हैं| इसे मात्र संवाद और अभिव्यक्ति का माध्यम समझें तो बेहतर होगा | भाषा की विविधता हमारी सांझी विरासत है और इसे क़ायम रखना हमारा फ़र्ज़ है |मेरा मक़सद यहाँ भाषा पे ज्ञान बांटना क़तई नहीं है पर आदतन रहा नहीं जाता क्यूंकि कुछ माहौल ही ऐसा है। आने वाले दिनों में कुछ छुटपुट कवितायेँ और कहानियां साँझा करने का विचार है। आज कल यूँही छोटामोटा लिख रही हूँ यहाँ वहां। हिंदी में लिखी दिल्ली शहर की कविताओं की किताब पर काम चल रहा है। सब कछुआ चाल हो गया है पर मैं इसे यूँही अपनी गति से चलने देना चाहती हूँ।

फरवरी के अंत से ही इस साल पर स्याही पुत गयी थी| बिगड़ी तबियत जब तक संभली लॉक डाउन पूरे ज़ोर पर था| अस्पताल से निकली तो हौज़ खास में फंस गयी| वो तीन महीने मेरे लिए आउटिंग थी | मानसिक तनाव और शारीरिक परेशानियों से उबरने का मौका| लॉक डाउन के उन दिनों ने बहुत कुछ सीखा दिया| ज़िन्दगी की वो घुटन जो मुझे छोड़े नहीं छोड़ती कुछ समय के लिए कहीं लज़ारबन्द हो गयी | तन मन में जैसे बसंत छ गया पर सुख अस्थायी होता है जबकि दुःख आपका एक छोर हमेशा पकडे रहता है | छुट्टी ख़तम हुई और फिर उसी उदासीन घुटन भरी ज़िन्दगी में वापस आ गयी |न जाने इस मकड़जाल से कब मुक्ति मिलेगी या नहीं मिलेगी | पर जब तक कला के रंग हैं, कविता है, ज़िन्दगी की गाड़ी जैसे तैसे चलती रहेगी |

इस त्रासदी के लगभग दो सौ दिन हो गए हैं । एक अजीब सा खालीपन है। किसी को मैंने कहा कि सब खोखला लगता है। मिथ्या। उसने पूछा, एक अंतहीन लॉक डाउन में जीने वाली को कैसा लगता है ये जबरन थोपा हुआ लॉक डाउन? तुम्हें तो कोई फर्क नहीं लगता होगा?

ड्रीम विदिन अ ड्रीम, मैंने कहा।

जो दिखता है वो है नहीं

जो है वो दिखता नहीं

आन्तरिक द्वंद और एक नीम शब

जो दिन की उजास भी खा गई है

लोगों ने मास्क क्या पहने उनके बाकी सभी नक़ाब उतर गए। दिन और तारीख़ धुंधलाने से लगे हैं। ज़िन्दगी का सारा हिसाब ही उलझ गया है। डार्क- ह्युमर में मुझे दिलचस्पी है पर ये कुछ ज़्यादा ही हो गया है। उदासी की भाषा अंग्रेज़ी हो या हिन्दी दोनों में शब्दों का अभाव हो रहा है। भाषा के इस सन्नाटे से भय लगता है। कहते हैं लिखो क्यूंकि लिखने से बहाव बना रहेगा। ये जीवन के लिए ज़रूरी है। आने वाली खुशियों और आशाओं के बारे में लिखो। आपदा में यही हिम्मत देगा। कैसे लिखूं। मैं अंधेरे से बनी हूं। कोई और रंग नहीं जानती।

एक शहर ये भी – कविता 5 – महरौली


 

 

बचपन में दिल्ली रिज पे रत्ती बटोरा करते थे
कॉलेज में दोस्तों का हाथ थामे किसी टूटी मुंडेर पे बैठे
क़ुतुब मीनार को ताकते या आवारगी के आलम में
युहीं फिरा करते, कीकर, बबूल,बिलाङ्गड़ा, पिलखन
के दरख्तों और जंगली झाड़ियों के बीच
हज़ारों बरसों की यादों को सहेजे मेहरौली की
संकरी गलियाँ, दरगाह, बावड़ी, मस्जिदें और मक़बरे
हमें शहर के शोरशराबे से दूर सुकूं का अहसास दिलाते,
आज फिर सोहनलाल की खस्ता कचौरी खाने निकले तो मन
रबड़ी फालूदा, समोसे चाट पकोड़ी कबाब, नहारी,
कोरमा और खमीरी रोटी की खुशबुओं में खो गया,
अलाई मीनार के पास निगाहें चुड़ैल पापड़ी पर
सदियों से बसे जिन्नो को फिर ढूढ़ने लगी पर
नाग फूल पर जाकर अटक गयीं और फिर
बड़े पीलू की बूढ़ी हड्डियों से सरसराती हुई
बेर के पेड़ में उलझ गयीं, बस यूँही पेड़ों की
परछाईयों में लुकते छिपते तुम कागज़ पर
नामों की लिस्ट बनाने लगे- ढ़ाक, रोंझ,
करील, देसी पापड़ी और न जाने क्या क्या,
तुम्हें पेड़ों से लगाव था और मैं मेहराब, गुम्बद,
दर-ओ -दीवार, झरोखों और जमाली कमाली
के खंडहरों में खो जाना चाहती थी,
जहाज महल, ज़फर महल, औलिया मस्जिद
की रूह को छूना चाहती थी, सैरगाहों, इबादतखानो,
हवेलियों में बीते कल को ढूढ़ना चाहती थी,
मोहम्मद शाह रंगीले की रंगों में रंगना चाहती थी,
मैं इस शहर की नब्ज़ टटोलना चाहती थी,
मेहरौली की वक़्त से भी लम्बी दास्ताँ इन धुल भरे
पत्थरों में ज़िंदा हैं और उसी की नब्ज़ पर हाथ रखे
हम चल पड़े,आँखों में रेत सी चुभती भद्दी नयी इमारतों,
कूड़े के ढेर और झाड़ झंकाड़ के बीच आखरी सांसें लेती,
अतीत की उन अनछुई दस्तानो को परत दर परत खोलने
युहीं घूमते फिरते हम सूरज गुरुब होने से पहले
पहुंचे ख्वाजा बख्तियार काकी की दरगाह पर,
सैर-ए-गुल फरोशां की यादों से मन महक उट्ठा ,
लोभान और गुलाब की खुशबू ,पेड़ों पे पंछियों का
कोलाहल, जाली में बंधे मन्नत के धागे, रौशनी की दुआ
के सजदे में झुके सर और क़व्वालों की गूँज से मुबारक
समां में बंधे हम मोहब्बत और अमन की शमा दिल में लिए
शाम के गहराते सायों में घुल गए और यूँ ख़तम हुआ
एक और दिन दिल्ली की गलियों में

एक शहर ये भी – कविता 3 – दिल्ली में बसंत


                                                          

 

दिल्ली में बसंत तो हर साल आता है

पर इस बार बहुत सालों बाद 

हमारे आँगन की अमराई महकी है

उसी रंग उसी गंध में सराबोर

वो सड़क जो तुम तक पहुँचती थी

नीम की बौर से ढकी है और कुछ दूर

चटख नारंगी सेमल धधक रहा है

तुम्हारे घर की दीवार से सटे टेसू ने यादें

फिर रंग दीं हैं और मन फिर उन्ही

महुआ की रातों में घुल गया है

वहीँ लोदी गार्डन में जहाँ मेरा फेवरेट बेंच

कचनार की गुलाबी महक में डूबा हुआ है

वहीँ दबे पाँव जाने कब उस गुलाबी बोगनविला ने

डक पोंड के पास वाले तुम्हारे पसंदीदा बेंच को

क्लाद मोने की पेंटिंग में बदल दिया है 

दिल्ली में बसंत बिलकुल तुम्हारे प्यार जैसा है –

क्षणिक  – अविस्मरणीय