Aao parosen kuch lamhe is khwabon ki tshtari me


आज बड़े दिनों बाद ज़िन्दगी तुम मिली हो मुझसे
आओ करें कुछ गुफ्तगू
दोपहर की नरम धुप में बैठकर
बुने कुछ गलीचे रंगों से सराबोर
आओ परोसें कुछ लम्हे इस ख्वाबों की तश्तरी में
आओ आईने से झांकते अपने ही अक्स में
ढूंढें खुदको या फिर युहीं ख्वाहिशों की
सिलवटों में एक दूसरे को करें महसूस
या फिर याद करें उन भीगी रातों में
जुगनुओं का झिलमिलाना
आओ खोलें खिड़कियां मंन की
हों रूबरू खुदसे
पिरोएँ ख्वाहिशें गजरों में
भरें पींग, छूएं अम्बर को
आओ पूरे करें कुछ अधूरे गीत
छेड़ें कुछ नए तराने
आओ बिताएं कुछ पल साथ
देखें सूरज को पिघलते हुए
इस सुरमयी शाम के साये तले
आओ चुने स्याही में लिपटे सितारे
बनायें इस रात को एक नज़्म
आओ परोसें कुछ लम्हे इस ख्वाबों की तश्तरी में

Intezar


 

फीर हुईं अश्क से नम् आँखें मेरी
फीर उठा दर्द आज सीने में
फीर तेरी याद सीने से लगाये
ढूढ़ते रहे हम तुझे शाम के
बेनूर अंधेरों में

तनहा थी मैं जब तक
तुम ना मीलेे थे
फीर तुम मिले , गम मीले ,
और इक कारवां सा बन गया

ओस से भीगी है रात कि अश्कों से
कर रहें हैं हम इन्तेज़ार बरसों से
सी लियें है लब तुने क्या जाने हम
वजह क्या है
इतनी ऊँची हैं दीवारें जो तुमने
बनायीं है हमारे बीच
वर्ना जान लेते थे हम सबब उदासी का
सिर्फ नज़रों से

बढालो फासले , मौन की ओढ़ लो चादर
बंद करदो सारे ज़रिये , सारे रस्ते
जो तुम तक पहुँचते हैं
मगर तुम देखना मेरी जां
तुम जिंतना दूर जाओगे
उनते ही करीब आओगे

ना जी सकोगे तुम ये हमें है पता
कर लो सारे जतन मुझे मालूम है
गर है मेरी मोहब्बत मी दम
एक दिन तुम लौट के ज़रूर आओगे