Summer Flowers, Poetry & Other News


Petrea flowers

Some one asked me if trees and flowers were my latest obsession. No, I said, it’s been a life long love affair but lately I have come out unafraid and showing it with pride. Delhi has given us a gorgeous spring summer offering when it comes to flowering trees. Last years show was a bit dampening but this year the city palette is smudged with every hue possible. This year I braved the heat and sun despite of my health concerns and went wandering in the city. What greeted me were vibrant coral trees, stunning palash, flaming gulmohars, magnificent kachnars, baikain and jacarandas and then the laburnums which are my favorite.

Moulmein Rosewood

Moulmein Rosewood

The gorgeous pink cassia and neem flowering in abundance. I saw sita ashok, Moulmein Rosewood and laal kund in bloom for the first time and it was not just the flowers but the fruits too that stole my heart.

Chamrod berries

The chamrod was fruiting and the tree full of glassy red orange berries were a delight to watch. While laburnum is stealing the show this year one can’t ignore the delicate crepe like Jarul flowers that are adding to color palette.

Jarul | Queen Crape Myrtle | pride of India

I also witnessed the pilkhan change colors and the mahua blossoming and then changing its leaves. You can visit my Instagram page to see some of my paintings of Delhi flowers and the actual flowering too.

In the midst of this flower show mango trees bloomed and then fruited. Nature has been benevolent this time. As I work on my Hindi Poetry book and other pending drafts I find less time to post more poems/stories here. Most of the journals seek unpublished work. So I will keep sharing the news if something finds a home. I am, meanwhile, still looking for a home. Perhaps I may eventually shift to some senior citizen home and find some work there or some place nearby. The financial constraints and lack of support is like a finger on the jugular.

Dhak / Tesu / Palash

The good news is that  two of my poems got a place in Cafe Dissensus magazine in February and got tremendous appreciation from poetry lovers across the globe. It was heartwarming to see strangers leaving words of appreciation in the comment section. Such engagement always encourages me to write more and write better.

Here is an excerpt :

“two a.m. on Delhi’s post-rain Sunday
I try to wash away the sleepiness
from my insomnia laden eyes
pick a fresh sheet of paper
spread clean water till it sheens
like fresh snow on a sunny day
clean and load the brushes with colours
drop and watch in wonderment
as the colours bleed and waltz
into the white stillness”

Read more HERE

City’s midsummer dream

Another set of poems recently again got published in the same magazine but this time with a note, a few photographs and a watercolor painting by me. You can read this here – Poetry In The Time Of Amaltas 

These poems are special because of many reasons including thatthey were written as a larger set on a call given by Mayank Austen Soofi aka The Delhi Walla in celebration of the Laburnums of Delhi. I admire his work as a chronicler of my city and it was an immerse joy to get featured in his daily city dispatch that he writes for The Hindustan Times.

You can read my poem HERE

Another beautiful opportunity came my way by writing for the famous column  called – ‘Farewell Notice- Our Self Written Obituaries’ on his popular blog. You can read it HERE 

The elegant Kachnar in full bloom

Now another special news that I had to share. While Tavish, my old time blogging buddy, bought ‘Wayfaring’ and sent a reader’s pic with a note about how much he is enjoying the book, Madhulika Liddle whom I had met at an event and gifted the book reviewed it on Goodreads. A pleasant  surprise and a cherished one too.

Here is an excerpt,” This collection of poems is divided into several sections: Trains, Exile Poems, Remembrance, Travel, Mosaic, Acrostics and Delhi Poems. Remembrance is the largest section, but these actually aren’t the only poems that talk of memories: in fact, most of Tikuli’s poems have a very strong aspect of remembrance, often a touching backward glance at the past, combined with a waiting—sometimes hopeful, more often despairing. 

In all of the poems in Wayfaring, a couple of things stand out. One (and this is what impressed me the most) is the poet’s ability to conjure up word pictures. She is so good at imagery that every now and then, I found myself transported to the place in question, seeing it, smelling it, feeling it. Whether it’s the Himalayas or the Kashmir Valley or Delhi (or Varanasi, as in the memorable On the Banks of the Ganges), she evokes it brilliantly. 

Then, there is the depth of feeling which comes through. Often, it’s a feeling of loss (this comes through, for me at least, most strongly in the Exile Poems, which so poignantly depict the pain of the forced exile of Kashmiri Pandits from the Valley). There is despair, as in Exhaustion – 2, which is shatteringly tragic, and so true. ” 

Read it all HERE 

Do buy the book from any online book vendor across the globe.

A lot more is in store and I will be updating the blog with recipes and travel posts regularly for sometime. Will also keep sharing the poetry news. Another poem and a few more photographs of a city park will also be shared shortly.

Till then keep reading and sharing your views.

Pink Cassia haze on a hot summer noon

 

Advertisements

एक शहर ये भी – कविता 7 – रात आईना है …


 

रात आईना है इस शहर की बेख्वाब आँखों का
शाम ढले जब धुप का आखरी उजाला
पेड़ों की टहनियों में सिमट जाता हैं तो ये शहर
किसी पेंटिंग की तरह रहस्मयी हो जाता है
बची खुची रौशनी लैम्पोस्ट के नीचे
सिमट जाती है और समय अँधेरे कोनों
या भूले बिसरे हाशियों में छिप जाता है
सूखे ठूँठ सी खड़ी इमारतें अपननी थकी आखें
बंद किये अँधेरा ओढ़ अचेत सी सो जाती हैं
और फिर उभरने लगते हैं अक्स उस दिल्ली के
जो दिन में अपनी तन्हाई समेटे ताकती रहती है
टुकड़ों में बंटे एक अजनबी से आसमान को
शहर की इन बिखरी सड़कोंऔर सुनसान
चौराहों पे मैं भी इन्हीं अक्सों में ढूढ़ता हूँ अपना
खोया हुआ वो अक्स जो अपना सा तो है पर
है फिर भी बेगाना, ढिबरियों सी टिमटिमाती
रौशनी में आता है नज़र आता है स्लेटी खंडहरों के
खूँट पे टंगा तनहा सा इक शहर उतार फेंका था
कभी जिसे और आती है नज़र एक सांवली सी नदी
राह भूली बाँवरी सी, पेड़ तोड़ देते हैं क़तारें
स्याह सड़कों के किनारे, चहचहाते डोलते हैं
पंख सी बाहें पसारे, सप्तपर्णी सी महक
उठती है हवा, रात में ही सांस लेता है शहर
थकन की चादर बिछा कर, फ़िक्र ज़माने की छोड़
है कोई सो रहा वो देखो चाँदनी को ओढ़
कुछ ख्वाब औंधे हैं पड़े उस पुराने बरगद परे
गीत कोई गा रहा है याद के पनघट ख़ड़े
सड़क किनारे बैठ पी रहा है कोई ख्वाबों की चिलम,
उठ रहा है धुआं सुलगते आलाव से कहीं
लिए सोंधी सी महक एक गुज़ारे वक़्त की
दिन की दमकती जिल्द में क़ैद सफहों से
झांकते हैं सूखे हुए लम्हे, कुछ भूले हुए
रुकए और मिटटी के सकोरों सी बिखरी
हुयी कुछ यादें, रात आईना है उन्हीं तवारीख़
के टुकड़ों का, तुम भी कभी खाँचो में बंटे उजालों से निकल
थाम लेना स्याह सा कोई इक छोर और फिर मिलना
उस दिल्ली से जो कभी हमारी थी

 

एक शहर ये भी – कविता 6 – दिल्ली ६


आज युहीं पुरानी दिल्ली की उन जानी अनजानी
तंग गलियों में लौट जाने का मन हुआ
गलियां ऐसी की लखनऊ की भुलभुलैया
फीकी पड़ जाये, चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन
से उतर हम भी हो लिए लोगों के उमड़ते
हुजूम के साथ, नयी दिल्ली का नक्शा
चाहे बदल गया हो यहाँ कुछ नहीं बदला
नूर से नहायी सहरी की सुबहें, इफ्तार
की पाकीज़ा शामें और जामा मस्जिद की
सीढ़ियों पे रेकॉर्डतोड़ गर्मी से बेपरवाह,
बेफ़िक़्र खेलते नन्हे रोज़दार जिन्हें
इंतज़ार है तो बसआने वाली ईद का
आसमां पे वही ढलते सूरज की लाली,
शाम ए इफ्तार की रंगत में सराबोर
बाज़ार, ख़ुशी से दमकते चेहरे,
मस्जिद से आती आज़ान की गूँज
दरगाह हज़रत सरमद शहीद
की जाली से बंधे लाल धागे में
लिपटी एक बाली और इबादत
की रौशनी से गुलज़ार मेरा मन
आज भी उर्दू बाज़ार से मटिआ महल
और चितली क़बर से हवेली आज़म खान
तक सिवइयों की खुशबू से महकती दुकानें
याद दिलाती हैं दोस्तों की वो अड्डेबाज़ी,
वो लौंग चुरी कबाब और कालना स्वीट्स
की पनीर जलेबी, वो लज़ीज़ निहारी कुलचे,
हाजी मोहम्मद अनवर की मिर्च मसाला बिरयानी,
कूल पॉइंट का शाही टुकड़ाऔर नवाब कुरैशी
का प्यार मोहब्बत मज़ा, वो तुम्हारा नज़रें बचा
फतेहपुरी मस्जिद से निकलना और तुम्हारे
इत्र की खुशबु से मेरी सांसों का महक जाना
मेरा तुम्हें चुपके से बालियाँ थमाना ओर
इसी बहाने तुम्हारे नाज़ुक हाथों का
छू जाना, गुड़ के शरबत सी मीठी
तुम्हारी हंसी, चूड़ियों की वो खनखनाहट
और चाट के तीखे मीठे सकोरों के बीच
कभी यूँही शरमा कर तुम्हारा मेरी बांहों में सिमट जाना
और ऐन मौके पर अशरफ चचा का बिज़ी हो जाना
जुगनुओं सी चमकती रात में जब हम आखिर जुदा होते
तो चचा अक्सर पैसे लेना भूल जाते, तुम नक़ाब ओढ़ना
और मैं घर का रस्ता भूल जाता
अब न तुम हो न फुर्सत के वो दिन रात है
और न ही वो दोस्त और न ही चचा जान
पर आज भी मैं शाहजानाबाद की इन रंगीनियों में
खिंचा चला आता हूँऔर यादों की मश्क़
कंधे पे उठाये यूँही हर नुक्कड़,
हर दर ओ दरवाज़े, हर झरोखे में

बस तुम्हें ढूढ़ता हूँ

इस कविता के बारे में कुछ कहना चाहूंगी | जयश्री शुक्ला से हमारी जानपहचान फेसबुक से हुई और ठोस ही समय में हम अच्छे दोस्त बन गए | जयश्री लाजवाब तस्वीरें खींचती हैं जो दिल्ली के हर रूप हर देखे अनदेखे पहलु से हमें रूबरू कराती हैं | आप उन्हें इंस्टाग्राम पर फॉलो कर सकते हैं. रमज़ान के इस पाक महीने में उनकी तस्वीरें देख मन उन्ही शाहजहानाबाद के गली कूचों में खो गया और कुछ यादें ताज़ा हो गयीं | कुछ फेर बदल कर इस कविता में हमने उन्हें ही संजोया है | इस इंस्पिरेशन के लिए जयश्री का तहे दिल से शुक्रिया |
अमिताभ मित्रा भी ऐसे ही हमारे एक कवी दोस्त हैं. पेशे से डॉक्टर हैं पर क्या खूब पेंटिंग करते हैं| कभी रंगों से तो कभी शब्दों से | कविता की दो लाइनें उनके एक अंग्रेजी कविता से प्रेरित हैं. तो उनका भी बहुत शुक्रिया |

एक शहर ये भी – कविता 4 – भूली बिसरी यादें


आज कुछ सायों से मुलाक़ात हुई
पुरानी यादें थी साथ हो लीं
दरयागंज में गोलचा सिनेमा के पास
संडे बुक मार्किट में किताबों के पन्ने पलटते हुए
पुराने दिन याद आ गए, भीड़भाड़, किताबों, सिक्को,
कपड़ों की छोटी छोटी दुकानों से गुज़रते हुए
हम दिल्ली गेट पहुंचे, यहीं सड़क पे जाती एक बस से
याद आयी डी टी सी की वो डबल डेकर बस
जिसमे हम कभी कभार छुट्टियों में
अंग्रेजी फिल्म देखने जाते थे
तब सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल का ज़माना था
और फिल्म देखना एक लग्जरी
दिल्ली में तब हरयाली ज़्यादा और
भीड़ कम दिखती थी और अक्सर
इन बसों की छतें डालियों की मार से
डेंटेड रहती थीं
१४-१५ साल की उम्र में इन
डबल डेकर बसों से दिल्ली शहर
कुछ अलग ही दिखता था
ये समय था फटफटिया, लम्ब्रेटा या वेस्पा स्कूटर का
सड़कों पे ज़्यादातर फिएट और एम्बेसडर
ही दिखती थीं या फिर कभी कभी किसी
रईस की फॉरेन गाड़ी सर्राटे ने निकल जाती थी
राजपथ पर साइकिलों का मजमा एक आम बात थी
ये वो समां था जहाँ सेंट्रल दिल्ली के पेवमेंट
जामुन से रंगे रहते थे और हम ठंडी मीठी गंडेरी
चबाते नीम की छांव में गर्मी की शामें काटा करते थे
ट्रैफिक के शोर से परे वो मीठी आवाज़ें कानों में गूंजने लगीं
“लैला की उंगलियां,मजनू की पसलियां, ताज़ा ताज़ा ककड़ियाँ”,
” फालसे काले काले, मुझसे भी ज़्यादा काले”, गंडेरी गुलाबवाली
मीठी मीठी मतवाली”, एक दबी सी मुस्कराहट होटों को छू गयी
और हम चल दिए उन्हीं गुलाबों की भीनी सी खुशबू लिए
शाहजहानाबाद की सैर को

एक शहर ये भी – कविता 1 – मॉर्निंग वॉक


कुछ समय पहले दिल्ली शहर से जुड़ी यादों को अंग्रेजी की कविताओं में पिरोया था पर हमेशा कुछ कमी सी महसूस होती रही| शायद हिंदी में लिखने की जो चाह थी वो अपनी ओर खींच रही थी ! कुछ पाठकों ने कहा रोमन में लिखिये देवनागरी समझ नहीं आती पर हिंदी भाषा का लुत्फ़ तो देवनागरी में ही आता है इसलिए सोचा एक सेट दिल्ली से  जुड़ी कविताओं का देवनारी में भी किया जाए|

मैंने इन कविताओं में अंग्रेजी के कई शब्द इस्तेमाल किये हैं तो ये पूरी तरह से हिंदी में भी नहीं हैं| एक एक्सपेरिमेंट हैं कुछ नया करने का|

मैंने दिल्ली का कायांतरण करीब से देखा है| देखा है इसके बदलते हुए व्यक्तित्व को| रोज़ ज़िंदा रहने की जद्दोजहद, भूख, बेरोज़गारी, बेकारी और रोज़ी रोटी की कभी का ख़तम होने वाली दौड़ के बीच में शहरी सौंदर्यीकरण के उस स्वांग को भी देखा है| धीमे धीमे अपने असली अस्तित्व को खोता ये शहर अब कहीं दिखावे की तमक झमक में खो सा गया है|

अक्सर मुझे एक गाना याद आता है ” सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शक्स परेशान सा क्यों है।”
दिल्ली का ये आधुनिक अवतार अक्सर मुझे बेचैन कर देता है. ज़िन्दगी की ठेलम ठेली, जानलेवा स्मोग, मटमैले दिन और बेगानी रातों के बीच बहती एक नदी जाने किस उम्मीद पर ज़िंदा है| शायद इसे भी उस सुबह की तलाश है जिसके इंतज़ार में हम निगाहें बिछाये बैठे हैं|हर साल मॉनसून में ये नदी अपने होने का एहसास दिलाती है फिर धीरे धीरे वापस अपने वर्तमान रूप में सिमट जाती है|

पर इस सबसे परे कई दिल्ली और भी हैं, अमलतास, गुलमोहर, टेसू, कनक चंपा और कचनार के फूलों से सजी दिल्ली, सप्तपर्णी, शिरीष सी महकती दिल्ली, महबूब ए इलाही के रंग में रंगी दिल्ली, आम के रास के डूबी दिल्ली, कड़क चाय की प्याली सी दिल्ली अमरक सी खट्टी दिल्ली और वहीँ प्राणी दिल्ली की चाट सी चटपटी दिल्ली, और कई ऐसी दिल्ली हैं इस शहर में|

और इन सबके बीच एक दिल्ली जो अब केवल इतिहास के पन्नो, पुरानी हवेलियों, किलों और मक़बरों में सिमट के रह गयी है| दिल्ली की दौड़ती भागती सड़कों से घिरी ये पुरानी इमारतें कई सदियों की धरोहर सहेजे स्मार्ट सिटी में अपनी पहचान खोने के डर से सहमी सी खड़ी आलीशान शॉपिंग मॉल, होटल, बहुमंज़िली इमारतो वाले दफ्तर और रईसों के बंगलों को ताकती रहती हैं|

कई बार युहीं दिल्ली की गलिओं की खाख छानते वो दिन याद आते हैं जब ज़िन्दगी इतनी उलझी हुई नहीं थी| इन कविताओं में कोशिश रहेगी इन्ही नयी पुरानी यादों को संजोने की कोशिश की गयी है | अपनी राय कमैंट्स में ज़रूर दें|

सभी कविताएं ‘एक शहर ये भी’ शीर्षक के साथ पोस्ट की जाएँगी ताकि पढ़ने में आसानी हो| आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा |

     मॉर्निंग वॉक 

धुएं और धुंध के दरमियाँ 
फुटपाथ पर बुझते अलावों से 
तपिश बटोरती खामोश निगाहें
ठिठुरते दरख़्तों के तले बैठी
ताक रहीं हैं स्याही में लिपटी
सूनी राहों को
सड़क के उस मोड़ पर समय
शायद थम सा गया है

वहीँ कुछ दूर चाय के स्टाल के करीब 
एक शहर करवट बदल रहा है
कुछ जाने पहचाने धुंधले से चेहरे 
फैन, बिस्कुट और चाय की प्यालों 
के बीच देश पे चर्चा, बीड़ी सिगरट 
के नोक पे सुलगते सवाल 
एक के लिए रोटी मुद्दा है
और दूसरे के लिए रोज़गार

चौराहे पे नीम के पेड़ पर टंगा 
अधमरा सा सूरज, नींद में चलती बसें 
और मुँह अँधेरे, कन्धों पर 
ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाये, 
रोज़ी रोटी की तलाश में 
सड़क पर चप्पल घिसते पैर 
शहर की सिलवटों में बसी
धूल खायी ज़िंदगियाँ,बर्बाद बचपन 
गुमनाम, गुमसुम, खामोश, 
ताश के पत्तों सा बिखरता जीवन 
– क्राइम एंड पनिशमेंट

 

Dargah – Hazrat Nizamuddin Aulia – A Poem


 

(Photograph courtesy Jayshree Shukla. Posted with due permission)

Love and faith light up the dense tangle of streets

that lead to the dargah of mehboob –e – ilahi,

and the tomb of his beloved disciple Khusro,

garbed in rose petals, attars, offerings

and a heady whiff of spiced kebabs,

lost words float across the treetops,

arches, patios and tombs, sometimes,

quietly they nestle in an empty nest

or whirl down onto the marbled floor

in an aerial dance—like dervishes,

caught in a mystical ecstasy, their souls

electrified by the rising crescendo of qawaals.

Possessed in a feverish frenzy of longing

and sensuousness, bodies dissolve

into each other and in turn into

the saint and the poet, love rises

as smoke at the end of the lit incense

and floats through the prayers

tied to the marble lattice

I sit in a corner, eyes closed – entranced,

the poet in me loses herself to the scents,

the sounds, the sights, the dust, the birds,

the trees, the sky, the marble, the songs,

and then dips herself in holy water

as green as the greenest emerald.

The sun seeks its path among

the silhouettes frozen in time.

I lean against the afternoon draped pillars

and feel my inner darkness melt

with their lengthening shadows,

the senescent walls soak up the pain

as I trace my fingers over them.

Across the courtyard, time, like a poem,

burns in the dua-e–roshni as the day

meets the loban perfumed night.

Two lovers completing each other

like two halves of a sphere.

It is in this cosmos

that the inexpressible exists,

visible to those eyes which can see.

(Based on one of my visits to the Dargah this is one of the poems in the Delhi Series.  First published in Asian Signature Magazine.)

Poem – Scent Of A Season


This poem was first published in Asian Signature Magazine.

 

Sitting on the verandah at dusk

I count the curling crisp brown leaves on a tree

and feel the autumn trailing in my bones,

a lemon scented breeze stirs my memories…

clusters of saptparni blooms crumbling in my hands,

their scent rising from the white carpeted pavements ,

intoxicating the night above them,

a smell of winter – nostalgia – childhood, love,

adolescence, youth, late night cigarette sessions

around makeshift fires on the terrace,

old monk, spliffs, long drives,

and your breath against mine.

There is more to it that lingers on in Lutyen’s Delhi

memories of a time I can’t forget.

Poetry News and An Interview


The rains are here and I have been busy writing poems. Some are about my travels and some others are in collaboration with a very fine writer/poet. This is a project very close to my heart.

Meanwhile, a very good friend Health Writer, Columnist and Weight Management Consultant Kavita Devgan   recommended me to be interviewed by We Are The City – India  and I am stoked to be featured here .

You can read the interview HERE 

Thanks Kavita nad Ashish for this opportunity.

In another news, some very precious poems from the Delhi Series found home in the August issue of prestigious Asian Signature – An international English Literary Journal. . The poems are part of ‘Contemporary Poets‘ section.

Thank you Surabhi Bhattacharjee for providing this platform to me.

Here is an excerpt from one of the poems :

 

Dargah – Hazrat Nizamuddin Aulia

Love and faith light up the dense tangle of streets

that lead to the dargah of mehboob –e – ilahi,

and the tomb of his beloved disciple Khusro,

garbed in rose petals, attars, offerings

and a heady whiff of spiced kebabs,

lost words float across the treetops,

arches, patios and tombs, sometimes,

quietly they nestle in an empty nest

or whirl down onto the marbled floor

in an aerial dance—like dervishes……. “

 

Read the rest and the other poems HERE 

 

Two more poems are accepted in a very good magazine. I will post the link soon. Till then, keep reading and don’t forget to share your views with me. Do follow the Blog FB page for other updates. .

 

 

 

Delhi Poems – 1. Lodi Garden


The fringes of the day lingered
on the rampart of Sikander Lodhi’s tomb,
moving on to the walls
that spanned out in a series of arches and columns
that stood like trees of life
supporting what remained of that glorious past.
Patches of light played hide and seek
on the buildings as the sun sought its path
among the silhouettes frozen in time.
I took the nearest path, shaded by arched trees,
the crowd was sparse, but love was everywhere—
on the rocks, behind the trees,
on the steps of the mausoleums,
over the eight-pier bridge,
in quiet corners screened by bamboos,
it even sprawled across the sloppy lawns
oblivious to the scattered graves,
or the cacophonous roosting birds.
Love doesn’t care about the mundane,
nor does the dust of the ancient bones
of dynasties that shaped Delhi.
I passed laughing children as
they teased ducks by the pond
and sat, eyes half closed against the sun,
a blade of grass between my teeth
watching the empty sky
from the shade of a blossoming Kachnar tree,
The breeze stirred the leaves,
their shadows moved,
a pair of cooing doves paused to listen
to rustling whispers
from the parapets dark birds flew like fragments
of charred paper rising from the fire,
a kite watched from the lonely turret.
Leaving the comfort of shadow play
I take the familiar path to reality,
harsh headlights, groping hands,
catcalls and swearing,
dust and fumes choking the city lungs,
the green grass merging into concrete,
the dying river
and night, now creeping across the sky
hiding the many sins of a city
more ruinous than the ruins I left behind.

This poem is part of the series of poems about Delhi that I am doing. It was first published in The Criterion – An international Journal In English’s Vol 7 .  Check out the journal for literary essays, poetry, fiction etc from world over.