एक शहर ये भी – कविता 8 – दरगाह हज़रत निजामुद्दीन


Pen and watercolor © Tikuli 

एक ख़ुशनुमा सुबह ख़ींच लायी मुझे
निज़ाम्मुद्दीन बस्ती की तंग गलियों में
मन जा रुक गया महबूब – ए – इलाही की
महकती चौखट पे और ग़म सब घुल गए
खुसरो की मोहब्बत के मदवे में,
इत्र और गुलाब से महकते दरख्तों की शाखों से
छन कर आती रौशनी में डोलते खोये खोये से
कुछ अल्फ़ाज़ ढूढ़ते थे शायद मेरी तरह आशियाँ कोई,
कभी छज्जों, मेहराबों कभी दरीचों पे, फिर चुपचाप
आ बैठते किसी परिंदे के सूने पड़े घरोंदे में
या फिर सुफियाना हवाओं से लिपट उतर आते
इश्क़ से पाक आँगन में महफ़िल ऐ समाअ की खुशबू
से बे-ख़ुद दरवेशों की तरह
रूह में रूह, जिस्म में जिस्म घुलने लगा
जब तान क़व्वाली की बुलंदी चढ़ी
इश्क़ उड़ चला धूनी से बन रेहमत का धुआं
और लगा समाने दुआ ऐ सब्र बन
मज़ार की जाली से बंधे मन्नतों के धागों में
न फिर खुदी रही न बेखुदी,
फ़िज़ा, दरख़्त, परिंदे , धुप, छाँव
सब मुझमे, मैं उनमे
समय एक श्म्म सा जलता रहा
 दुआ इ रौशनी के चरागों में
चश्मा ए दिलखुशा के सब्ज़ पानी
पर सुकूँ के गहराते साये और
लोभान से महकती शाम के दरमियाँ
 हज़रत औलिया की धूल माथे लिए
बाँध आयी मैं फिर एक मन्नत का डोरा
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एक शहर ये भी – कविता 5 – महरौली


 

 

बचपन में दिल्ली रिज पे रत्ती बटोरा करते थे
कॉलेज में दोस्तों का हाथ थामे किसी टूटी मुंडेर पे बैठे
क़ुतुब मीनार को ताकते या आवारगी के आलम में
युहीं फिरा करते, कीकर, बबूल,बिलाङ्गड़ा, पिलखन
के दरख्तों और जंगली झाड़ियों के बीच
हज़ारों बरसों की यादों को सहेजे मेहरौली की
संकरी गलियाँ, दरगाह, बावड़ी, मस्जिदें और मक़बरे
हमें शहर के शोरशराबे से दूर सुकूं का अहसास दिलाते,
आज फिर सोहनलाल की खस्ता कचौरी खाने निकले तो मन
रबड़ी फालूदा, समोसे चाट पकोड़ी कबाब, नहारी,
कोरमा और खमीरी रोटी की खुशबुओं में खो गया,
अलाई मीनार के पास निगाहें चुड़ैल पापड़ी पर
सदियों से बसे जिन्नो को फिर ढूढ़ने लगी पर
नाग फूल पर जाकर अटक गयीं और फिर
बड़े पीलू की बूढ़ी हड्डियों से सरसराती हुई
बेर के पेड़ में उलझ गयीं, बस यूँही पेड़ों की
परछाईयों में लुकते छिपते तुम कागज़ पर
नामों की लिस्ट बनाने लगे- ढ़ाक, रोंझ,
करील, देसी पापड़ी और न जाने क्या क्या,
तुम्हें पेड़ों से लगाव था और मैं मेहराब, गुम्बद,
दर-ओ -दीवार, झरोखों और जमाली कमाली
के खंडहरों में खो जाना चाहती थी,
जहाज महल, ज़फर महल, औलिया मस्जिद
की रूह को छूना चाहती थी, सैरगाहों, इबादतखानो,
हवेलियों में बीते कल को ढूढ़ना चाहती थी,
मोहम्मद शाह रंगीले की रंगों में रंगना चाहती थी,
मैं इस शहर की नब्ज़ टटोलना चाहती थी,
मेहरौली की वक़्त से भी लम्बी दास्ताँ इन धुल भरे
पत्थरों में ज़िंदा हैं और उसी की नब्ज़ पर हाथ रखे
हम चल पड़े,आँखों में रेत सी चुभती भद्दी नयी इमारतों,
कूड़े के ढेर और झाड़ झंकाड़ के बीच आखरी सांसें लेती,
अतीत की उन अनछुई दस्तानो को परत दर परत खोलने
युहीं घूमते फिरते हम सूरज गुरुब होने से पहले
पहुंचे ख्वाजा बख्तियार काकी की दरगाह पर,
सैर-ए-गुल फरोशां की यादों से मन महक उट्ठा ,
लोभान और गुलाब की खुशबू ,पेड़ों पे पंछियों का
कोलाहल, जाली में बंधे मन्नत के धागे, रौशनी की दुआ
के सजदे में झुके सर और क़व्वालों की गूँज से मुबारक
समां में बंधे हम मोहब्बत और अमन की शमा दिल में लिए
शाम के गहराते सायों में घुल गए और यूँ ख़तम हुआ
एक और दिन दिल्ली की गलियों में

एक शहर ये भी – कविता 3 – दिल्ली में बसंत


                                                          

 

दिल्ली में बसंत तो हर साल आता है

पर इस बार बहुत सालों बाद 

हमारे आँगन की अमराई महकी है

उसी रंग उसी गंध में सराबोर

वो सड़क जो तुम तक पहुँचती थी

नीम की बौर से ढकी है और कुछ दूर

चटख नारंगी सेमल धधक रहा है

तुम्हारे घर की दीवार से सटे टेसू ने यादें

फिर रंग दीं हैं और मन फिर उन्ही

महुआ की रातों में घुल गया है

वहीँ लोदी गार्डन में जहाँ मेरा फेवरेट बेंच

कचनार की गुलाबी महक में डूबा हुआ है

वहीँ दबे पाँव जाने कब उस गुलाबी बोगनविला ने

डक पोंड के पास वाले तुम्हारे पसंदीदा बेंच को

क्लाद मोने की पेंटिंग में बदल दिया है 

दिल्ली में बसंत बिलकुल तुम्हारे प्यार जैसा है –

क्षणिक  – अविस्मरणीय

एक शहर ये भी – कविता 2 – हुमायूँ का मक़बरा


 

सब्ज़ बुर्ज से कई बार हुमायूँ के मक़बरे तक

खामोश रास्तों पर हम कभी कभी युहीं

पैदल ही निकल जाते थे

निजामुद्दीन की हवा में एक खुमार सा है

जिसे लफ़्ज़ों में बयां करना मुश्किल है

एक अजीब सी कशिश, एक खुशबू

शायद उस नीली नदी की जो कभी

पास से गुज़रा करती थी

अमलतास के पेड़ के नीचे बैठ

हम घंटों दूब के क़ालीनों पर उभरते

शाम के सायों को मूक आखों से ताका करते

और परिंदों के कोलाहल के बीच

तन्हाई में लिपटा हुआ संगेमरमर

और बुलिअा पत्थरों से बना हश्त – बहिश्त

बेबस सा ये मक़बरा अपनी रगों में

मुग़ल सल्तनत की महक समेटे

बगीचे की नहरों के पानी में

कुछ ढूढ़ता रहता

और इस बीच आहिस्ता से समय

युहीं कहीं किसी

मेहराब या गुम्बद पे आके थम जाता

जड़ पकड़ लेता दरख्तों की तरह

हम अपने ख्वाबों की परवान को थामे 

किसी दर -ओ -दीवार की परछाईं

नापते और अतीत के झरोखों से

छन के आती सूरज की आख़री किरणों

में ज़िन्दगी के मायने खोजते

और फिर हाथों में हाथ दिए

बस्ती की तंग गलियों में निकल जाते

तुम कबाब और बिरयानी की खुशबु में खो जाते

और मैं महबूब ए इलाही के रंगों में रंग जाती

आज बारापुला फ्लाईओवर से

निजामुद्दीन बस्ती की छतों पे सूखते कपड़ो

 के पीछे उन्ही रंगों की महक उजले

नीले आसमान में उड़ती नज़र आयी

और मन फिर जा कर अमलतास की उस डाल

से लिपट गया

एक शहर ये भी – कविता 1