एक शहर ये भी – कविता 5 – महरौली


 

 

बचपन में दिल्ली रिज पे रत्ती बटोरा करते थे
कॉलेज में दोस्तों का हाथ थामे किसी टूटी मुंडेर पे बैठे
क़ुतुब मीनार को ताकते या आवारगी के आलम में
युहीं फिरा करते, कीकर, बबूल,बिलाङ्गड़ा, पिलखन
के दरख्तों और जंगली झाड़ियों के बीच
हज़ारों बरसों की यादों को सहेजे मेहरौली की
संकरी गलियाँ, दरगाह, बावड़ी, मस्जिदें और मक़बरे
हमें शहर के शोरशराबे से दूर सुकूं का अहसास दिलाते,
आज फिर सोहनलाल की खस्ता कचौरी खाने निकले तो मन
रबड़ी फालूदा, समोसे चाट पकोड़ी कबाब, नहारी,
कोरमा और खमीरी रोटी की खुशबुओं में खो गया,
अलाई मीनार के पास निगाहें चुड़ैल पापड़ी पर
सदियों से बसे जिन्नो को फिर ढूढ़ने लगी पर
नाग फूल पर जाकर अटक गयीं और फिर
बड़े पीलू की बूढ़ी हड्डियों से सरसराती हुई
बेर के पेड़ में उलझ गयीं, बस यूँही पेड़ों की
परछाईयों में लुकते छिपते तुम कागज़ पर
नामों की लिस्ट बनाने लगे- ढ़ाक, रोंझ,
करील, देसी पापड़ी और न जाने क्या क्या,
तुम्हें पेड़ों से लगाव था और मैं मेहराब, गुम्बद,
दर-ओ -दीवार, झरोखों, मेहराबों और जमाली कमाली
के खंडहरों में खो जाना चाहती थी, शम्सी तालाब,
जहाज महल, ज़फर महल, औलिया मस्जिद
की रूह को छूना चाहती थी, सैरगाहों, इबादतखानो,
हवेलियों में बीते कल को ढूढ़ना चाहती थी,
मोहम्मद शाह रंगीले की रंगों में रंगना चाहती थी,
मैं दइस शहर की नब्ज़ टटोलना चाहती थी,
मेहरौली की वक़्त से भी लम्बी दास्ताँ इन धुल भरे
पत्थरों में ज़िंदा हैं और उसी की नब्ज़ पर हाथ रखे
हम चल पड़े,आँखों में रेत सी चुभती भद्दी नयी इमारतों,
कूड़े के ढेर और झाड़ झंकाड़ के बीच आखरी सांसें लेती,
अतीत की उन अनछुई दस्तानो को परत दर परत खोलने
युहीं घूमते फिरते हम सूरज गुरुब होने से पहले
पहुंचे ख्वाजा बख्तियार काकी की दरगाह पर,
सैर-ए-गुल फरोशां की यादों से मन महक उट्ठा ,
लोभान और गुलाब की खुशबू ,पेड़ों पे पंछियों का
कोलाहल, जाली में बंधे मन्नत के धागे, रौशनी की दुआ
के सजदे में झुके सर और क़व्वालों की गूँज से मुबारक
समां में बंधे हम मोहब्बत और अमन की शमा दिल में लिए
शाम के गहराते सायों में घुल गए और यूँ ख़तम हुआ
एक और दिन दिल्ली की गलियों में

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एक शहर ये भी – कविता 4 – भूली बिसरी यादें


आज कुछ सायों से मुलाक़ात हुई
पुरानी यादें थी साथ हो लीं
दरयागंज में गोलचा सिनेमा के पास
संडे बुक मार्किट में किताबों के पन्ने पलटते हुए
पुराने दिन याद आ गए, भीड़भाड़, किताबों, सिक्को,
कपड़ों की छोटी छोटी दुकानों से गुज़रते हुए
हम दिल्ली गेट पहुंचे, यहीं सड़क पे जाती एक बस से
याद आयी डी टी सी की वो डबल डेकर बस
जिसमे हम कभी कभार छुट्टियों में
अंग्रेजी फिल्म देखने जाते थे
तब सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल का ज़माना था
और फिल्म देखना एक लग्जरी
दिल्ली में तब हरयाली ज़्यादा और
भीड़ कम दिखती थी और अक्सर
इन बसों की छतें डालियों की मार से
डेंटेड रहती थीं
१४-१५ साल की उम्र में इन
डबल डेकर बसों से दिल्ली शहर
कुछ अलग ही दिखता था
ये समय था फटफटिया, लम्ब्रेटा या वेस्पा स्कूटर का
सड़कों पे ज़्यादातर फिएट और एम्बेसडर
ही दिखती थीं या फिर कभी कभी किसी
रईस की फॉरेन गाड़ी सर्राटे ने निकल जाती थी
राजपथ पर साइकिलों का मजमा एक आम बात थी
ये वो समां था जहाँ सेंट्रल दिल्ली के पेवमेंट
जामुन से रंगे रहते थे और हम ठंडी मीठी गंडेरी
चबाते नीम की छांव में गर्मी की शामें काटा करते थे
ट्रैफिक के शोर से परे वो मीठी आवाज़ें कानों में गूंजने लगीं
“लैला की उंगलियां,मजनू की पसलियां, ताज़ा ताज़ा ककड़ियाँ”,
” फालसे काले काले, मुझसे भी ज़्यादा काले”, गंडेरी गुलाबवाली
मीठी मीठी मतवाली”, एक दबी सी मुस्कराहट होटों को छू गयी
और हम चल दिए उन्हीं गुलाबों की भीनी सी खुशबू लिए
शाहजहानाबाद की सैर को

एक शहर ये भी – कविता 2 – हुमायूँ का मक़बरा


 

सब्ज़ बुर्ज से कई बार हुमायूँ के मक़बरे तक

खामोश रास्तों पर हम कभी कभी युहीं

पैदल ही निकल जाते थे

निजामुद्दीन की हवा में एक खुमार सा है

जिसे लफ़्ज़ों में बयां करना मुश्किल है

एक अजीब सी कशिश, एक खुशबू

शायद उस नीली नदी की जो कभी

पास से गुज़रा करती थी

अमलतास के पेड़ के नीचे बैठ

हम घंटों दूब के क़ालीनों पर उभरते

शाम के सायों को मूक आखों से ताका करते

और परिंदों के कोलाहल के बीच

तन्हाई में लिपटा हुआ संगेमरमर

और बुलिअा पत्थरों से बना हश्त – बहिश्त

बेबस सा ये मक़बरा अपनी रगों में

मुग़ल सल्तनत की महक समेटे

बगीचे की नहरों के पानी में

कुछ ढूढ़ता रहता

और इस बीच आहिस्ता से समय

युहीं कहीं किसी

मेहराब या गुम्बद पे आके थम जाता

जड़ पकड़ लेता दरख्तों की तरह

हम अपने ख्वाबों की परवान को थामे 

किसी दर -ओ -दीवार की परछाईं

नापते और अतीत के झरोखों से

छन के आती सूरज की आख़री किरणों

में ज़िन्दगी के मायने खोजते

और फिर हाथों में हाथ दिए

बस्ती की तंग गलियों में निकल जाते

तुम कबाब और बिरयानी की खुशबु में खो जाते

और मैं महबूब ए इलाही के रंगों में रंग जाती

आज बारापुला फ्लाईओवर से

निजामुद्दीन बस्ती की छतों पे सूखते कपड़ो

 के पीछे उन्ही रंगों की महक उजले

नीले आसमान में उड़ती नज़र आयी

और मन फिर जा कर अमलतास की उस डाल

से लिपट गया

एक शहर ये भी – कविता 1

Adhuure Alfaaz | अधूरे अलफ़ाज़


 

            परछाइयाँ

वीरां गुलिस्तां, उजड़े दरख़्त. खामोश परिंदे

अजनबी सी लगती हैं अब ये दर ओ दीवार,

बोझल साँसे, जिस्म सर्द, अल्फ़ाज़ नश्तर,

निगाहें अंगारे, बयाबान-ए-यास सब कटरे,

 मोहल्ले, चौखट, चौबारे, तंग गलियाँ,

वहशी सन्नाटे, बंद खिड़कियों मे गिरफ्ता

ख़ौफ़-ज़दा चेहरे, बे ख़्वाब, बेनूर हैं सारे नज़ारे,

फ़ज़ा-ए-ग़म में सिसकती है ख़ूँ-रेज़ रूह इस शहर की  

नफरतों की जंग ने जिसे रातों रात बेवा कर दिया

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ख़ुसरो तेरी तंग गलिओं की महक में उल्झा है यूँ दिल मेरा 
के अब तेरे दर पे आके ही होगी मुक़म्मल मेरी ये नज़्म-ए-ज़िन्दगी

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एक अरसे से हूँ क़ैद इसी आईने में

अब तेरे अक्स में घुल जाऊं तो रिहा हो जाऊं

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अक्स

उभरते हैं कुछ अक्स आईने में हर रोज़,

ताकते रहते हैं बेबस से खामोश दीवारों को,

धुंधले, कभी साफ़, कभी खोए खोये से

जैसे के हों किसी ख्वाब में तैरते कोई ख्वाब,

या किसी ना-मुकम्मल दास्ताँ

का इक़्तिबास, या फिर कोई चाह

असीर चंद लफ़्ज़ों में, वो राज़ ए निहाँ,

वो भूले से नग्मात, वो माशूक चेहरे

वो मख़मूर रातें, वो आबरू के दायरे,

वो मज़हब की कटारें, वो दाग़ – ऐे – तन्हाई

वो गिरहें, जाल फरेब निगाहें, वो ख़्वाब

जिनकी ग़ैर-मुमकिन थी तकमील, इन्हीं

अक्सों के सियह सायों में रेज़ा रेज़ा मेरा भी

अक्स  डोलता है बंजारा सा,  बे रंग, बे नूर,

आइना गिरफ़्त सदियों से

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अधूरे अलफ़ाज़

मुफ़लिसी ऐसी के ग़म भी लेने पड़े उधार
क्या कहेँ किस क़दर क़र्ज़ में डूबा है
गुलशन का कारोबार

आलम ये है के महफिलें अधूरी पल अधूरे अधूरे से सब अल्फाज़
सुकूं अधूरा वफा अधूरी सितम् अधूरे शिक़वे अधूरे अधूरे हैं हर साज़
तमन्ना अधुरी अरमां अधूरे गीत अधूरे रह गयी अधूरी शौक़ मुलाक़ात की रात
रहने दो क्या बताएं हाल दिल तुमको मेरे दिलबर मेरे ग़मगुसार
खामोशी तुम समझोगे नहीं और बयां हमसे होगा नहीं