एक शहर ये भी – कविता 3 – दिल्ली में बसंत


                                                          

 

दिल्ली में बसंत तो हर साल आता है

पर इस बार बहुत सालों बाद 

हमारे आँगन की अमराई महकी है

उसी रंग उसी गंध में सराबोर

वो सड़क जो तुम तक पहुँचती थी

नीम की बौर से ढकी है और कुछ दूर

चटख नारंगी सेमल धधक रहा है

तुम्हारे घर की दीवार से सटे टेसू ने यादें

फिर रंग दीं हैं और मन फिर उन्ही

महुआ की रातों में घुल गया है

वहीँ लोदी गार्डन में जहाँ मेरा फेवरेट बेंच

कचनार की गुलाबी महक में डूबा हुआ है

वहीँ दबे पाँव जाने कब उस गुलाबी बोगनविला ने

डक पोंड के पास वाले तुम्हारे पसंदीदा बेंच को

क्लाद मोने की पेंटिंग में बदल दिया है 

दिल्ली में बसंत बिलकुल तुम्हारे प्यार जैसा है –

क्षणिक  – अविस्मरणीय

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एक शहर ये भी – कविता 2 – हुमायूँ का मक़बरा


 

सब्ज़ बुर्ज से कई बार हुमायूँ के मक़बरे तक

खामोश रास्तों पर हम कभी कभी युहीं

पैदल ही निकल जाते थे

निजामुद्दीन की हवा में एक खुमार सा है

जिसे लफ़्ज़ों में बयां करना मुश्किल है

एक अजीब सी कशिश, एक खुशबू

शायद उस नीली नदी की जो कभी

पास से गुज़रा करती थी

अमलतास के पेड़ के नीचे बैठ

हम घंटों दूब के क़ालीनों पर उभरते

शाम के सायों को मूक आखों से ताका करते

और परिंदों के कोलाहल के बीच

तन्हाई में लिपटा हुआ संगेमरमर

और बुलिअा पत्थरों से बना हश्त – बहिश्त

बेबस सा ये मक़बरा अपनी रगों में

मुग़ल सल्तनत की महक समेटे

बगीचे की नहरों के पानी में

कुछ ढूढ़ता रहता

और इस बीच आहिस्ता से समय

युहीं कहीं किसी

मेहराब या गुम्बद पे आके थम जाता

जड़ पकड़ लेता दरख्तों की तरह

हम अपने ख्वाबों की परवान को थामे 

किसी दर -ओ -दीवार की परछाईं

नापते और अतीत के झरोखों से

छन के आती सूरज की आख़री किरणों

में ज़िन्दगी के मायने खोजते

और फिर हाथों में हाथ दिए

बस्ती की तंग गलियों में निकल जाते

तुम कबाब और बिरयानी की खुशबु में खो जाते

और मैं महबूब ए इलाही के रंगों में रंग जाती

आज बारापुला फ्लाईओवर से

निजामुद्दीन बस्ती की छतों पे सूखते कपड़ो

 के पीछे उन्ही रंगों की महक उजले

नीले आसमान में उड़ती नज़र आयी

और मन फिर जा कर अमलतास की उस डाल

से लिपट गया

एक शहर ये भी – कविता 1

एक शहर ये भी – कविता 1 – मॉर्निंग वॉक


कुछ समय पहले दिल्ली शहर से जुड़ी यादों को अंग्रेजी की कविताओं में पिरोया था पर हमेशा कुछ कमी सी महसूस होती रही| शायद हिंदी में लिखने की जो चाह थी वो अपनी ओर खींच रही थी ! कुछ पाठकों ने कहा रोमन में लिखिये देवनागरी समझ नहीं आती पर हिंदी भाषा का लुत्फ़ तो देवनागरी में ही आता है इसलिए सोचा एक सेट दिल्ली से  जुड़ी कविताओं का देवनारी में भी किया जाए|

मैंने इन कविताओं में अंग्रेजी के कई शब्द इस्तेमाल किये हैं तो ये पूरी तरह से हिंदी में भी नहीं हैं| एक एक्सपेरिमेंट हैं कुछ नया करने का|

मैंने दिल्ली का कायांतरण करीब से देखा है| देखा है इसके बदलते हुए व्यक्तित्व को| रोज़ ज़िंदा रहने की जद्दोजहद, भूख, बेरोज़गारी, बेकारी और रोज़ी रोटी की कभी का ख़तम होने वाली दौड़ के बीच में शहरी सौंदर्यीकरण के उस स्वांग को भी देखा है| धीमे धीमे अपने असली अस्तित्व को खोता ये शहर अब कहीं दिखावे की तमक झमक में खो सा गया है|

अक्सर मुझे एक गाना याद आता है ” सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शक्स परेशान सा क्यों है।”
दिल्ली का ये आधुनिक अवतार अक्सर मुझे बेचैन कर देता है. ज़िन्दगी की ठेलम ठेली, जानलेवा स्मोग, मटमैले दिन और बेगानी रातों के बीच बहती एक नदी जाने किस उम्मीद पर ज़िंदा है| शायद इसे भी उस सुबह की तलाश है जिसके इंतज़ार में हम निगाहें बिछाये बैठे हैं|हर साल मॉनसून में ये नदी अपने होने का एहसास दिलाती है फिर धीरे धीरे वापस अपने वर्तमान रूप में सिमट जाती है|

पर इस सबसे परे कई दिल्ली और भी हैं, अमलतास, गुलमोहर, टेसू, कनक चंपा और कचनार के फूलों से सजी दिल्ली, सप्तपर्णी, शिरीष सी महकती दिल्ली, महबूब ए इलाही के रंग में रंगी दिल्ली, आम के रास के डूबी दिल्ली, कड़क चाय की प्याली सी दिल्ली अमरक सी खट्टी दिल्ली और वहीँ प्राणी दिल्ली की चाट सी चटपटी दिल्ली, और कई ऐसी दिल्ली हैं इस शहर में|

और इन सबके बीच एक दिल्ली जो अब केवल इतिहास के पन्नो, पुरानी हवेलियों, किलों और मक़बरों में सिमट के रह गयी है| दिल्ली की दौड़ती भागती सड़कों से घिरी ये पुरानी इमारतें कई सदियों की धरोहर सहेजे स्मार्ट सिटी में अपनी पहचान खोने के डर से सहमी सी खड़ी आलीशान शॉपिंग मॉल, होटल, बहुमंज़िली इमारतो वाले दफ्तर और रईसों के बंगलों को ताकती रहती हैं|

कई बार युहीं दिल्ली की गलिओं की खाख छानते वो दिन याद आते हैं जब ज़िन्दगी इतनी उलझी हुई नहीं थी| इन कविताओं में कोशिश रहेगी इन्ही नयी पुरानी यादों को संजोने की कोशिश की गयी है | अपनी राय कमैंट्स में ज़रूर दें|

सभी कविताएं ‘एक शहर ये भी’ शीर्षक के साथ पोस्ट की जाएँगी ताकि पढ़ने में आसानी हो| आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा |

     मॉर्निंग वॉक 

धुएं और धुंध के दरमियाँ 
फुटपाथ पर बुझते अलावों से 
तपिश बटोरती खामोश निगाहें
ठिठुरते दरख़्तों के तले बैठी
ताक रहीं हैं स्याही में लिपटी
सूनी राहों को
सड़क के उस मोड़ पर समय
शायद थम सा गया है

वहीँ कुछ दूर चाय के स्टाल के करीब 
एक शहर करवट बदल रहा है
कुछ जाने पहचाने धुंधले से चेहरे 
फैन, बिस्कुट और चाय की प्यालों 
के बीच देश पे चर्चा, बीड़ी सिगरट 
के नोक पे सुलगते सवाल 
एक के लिए रोटी मुद्दा है
और दूसरे के लिए रोज़गार

चौराहे पे नीम के पेड़ पर टंगा 
अधमरा सा सूरज, नींद में चलती बसें 
और मुँह अँधेरे, कन्धों पर 
ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाये, 
रोज़ी रोटी की तलाश में 
सड़क पर चप्पल घिसते पैर 
शहर की सिलवटों में बसी
धूल खायी ज़िंदगियाँ,बर्बाद बचपन 
गुमनाम, गुमसुम, खामोश, 
ताश के पत्तों सा बिखरता जीवन 
– क्राइम एंड पनिशमेंट

 

Adhuure Alfaaz | अधूरे अलफ़ाज़


 

            परछाइयाँ

वीरां गुलिस्तां, उजड़े दरख़्त. खामोश परिंदे

अजनबी सी लगती हैं अब ये दर ओ दीवार,

बोझल साँसे, जिस्म सर्द, अल्फ़ाज़ नश्तर,

निगाहें अंगारे, बयाबान-ए-यास सब कटरे,

 मोहल्ले, चौखट, चौबारे, तंग गलियाँ,

वहशी सन्नाटे, बंद खिड़कियों मे गिरफ्ता

ख़ौफ़-ज़दा चेहरे, बे ख़्वाब, बेनूर हैं सारे नज़ारे,

फ़ज़ा-ए-ग़म में सिसकती है ख़ूँ-रेज़ रूह इस शहर की  

नफरतों की जंग ने जिसे रातों रात बेवा कर दिया

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ख़ुसरो तेरी तंग गलिओं की महक में उल्झा है यूँ दिल मेरा 
के अब तेरे दर पे आके ही होगी मुक़म्मल मेरी ये नज़्म-ए-ज़िन्दगी

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एक अरसे से हूँ क़ैद इसी आईने में

अब तेरे अक्स में घुल जाऊं तो रिहा हो जाऊं

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अक्स

उभरते हैं कुछ अक्स आईने में हर रोज़,

ताकते रहते हैं बेबस से खामोश दीवारों को,

धुंधले, कभी साफ़, कभी खोए खोये से

जैसे के हों किसी ख्वाब में तैरते कोई ख्वाब,

या किसी ना-मुकम्मल दास्ताँ

का इक़्तिबास, या फिर कोई चाह

असीर चंद लफ़्ज़ों में, वो राज़ ए निहाँ,

वो भूले से नग्मात, वो माशूक चेहरे

वो मख़मूर रातें, वो आबरू के दायरे,

वो मज़हब की कटारें, वो दाग़ – ऐे – तन्हाई

वो गिरहें, जाल फरेब निगाहें, वो ख़्वाब

जिनकी ग़ैर-मुमकिन थी तकमील, इन्हीं

अक्सों के सियह सायों में रेज़ा रेज़ा मेरा भी

अक्स  डोलता है बंजारा सा,  बे रंग, बे नूर,

आइना गिरफ़्त सदियों से

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अधूरे अलफ़ाज़

मुफ़लिसी ऐसी के ग़म भी लेने पड़े उधार
क्या कहेँ किस क़दर क़र्ज़ में डूबा है
गुलशन का कारोबार

आलम ये है के महफिलें अधूरी पल अधूरे अधूरे से सब अल्फाज़
सुकूं अधूरा वफा अधूरी सितम् अधूरे शिक़वे अधूरे अधूरे हैं हर साज़
तमन्ना अधुरी अरमां अधूरे गीत अधूरे रह गयी अधूरी शौक़ मुलाक़ात की रात
रहने दो क्या बताएं हाल दिल तुमको मेरे दिलबर मेरे ग़मगुसार
खामोशी तुम समझोगे नहीं और बयां हमसे होगा नहीं

Aao parosen kuch lamhe is khwabon ki tshtari me


आज बड़े दिनों बाद ज़िन्दगी तुम मिली हो मुझसे
आओ करें कुछ गुफ्तगू
दोपहर की नरम धुप में बैठकर
बुने कुछ गलीचे रंगों से सराबोर
आओ परोसें कुछ लम्हे इस ख्वाबों की तश्तरी में
आओ आईने से झांकते अपने ही अक्स में
ढूंढें खुदको या फिर युहीं ख्वाहिशों की
सिलवटों में एक दूसरे को करें महसूस
या फिर याद करें उन भीगी रातों में
जुगनुओं का झिलमिलाना
आओ खोलें खिड़कियां मंन की
हों रूबरू खुदसे
पिरोएँ ख्वाहिशें गजरों में
भरें पींग, छूएं अम्बर को
आओ पूरे करें कुछ अधूरे गीत
छेड़ें कुछ नए तराने
आओ बिताएं कुछ पल साथ
देखें सूरज को पिघलते हुए
इस सुरमयी शाम के साये तले
आओ चुने स्याही में लिपटे सितारे
बनायें इस रात को एक नज़्म
आओ परोसें कुछ लम्हे इस ख्वाबों की तश्तरी में

Sard siyah Raaten – A New Poem


shahr e gum se pare

ek ujda purana benur mandir

deewaron par barish ke  banaye nakqhe

aur yaden jo jagah jagah

qayi banker hari ho aayi hain

ek pehchani si khamoshi aur

kisi ke bhujte aalav se uthta  dhuaan

pedon ke jhurmutho pe gehrate saye

aur phigalte kajal si siyah raat ka kona pakde

badlon ke beech se guzarta hua

chand ka ek tukda

pehle bhi yuhin aaya karte the hum yahan

tab ye mandir aabad tha

gudgudati huyi sardi ki dhoop me

hum yuhin pedon tale khwaab buna karte the

purane bargad ki jataon ki tarah

wo bhi ulajh kar reh gaye hain

tumhe bhi to yaad honge wo pal

jab narm doob ke bichone par

seep si sard raaton me

jism ki lau taapa karte the hum

tere jane se kuch nahi badla

raat bhi aayi hai aur chaand bhi

aaj bhi us tapish ka dushala odhe

is benur mandir ke aangan me

yunhi jalta hain jism

aagosh me teri yadon ko liye

Sahar hone tak

tuhin chun chun ke

syahi se lipte sitare

ban jati hai har raat ik nazm

Updated 

शहर -ए -ग़म से परे
एक उजड़ा पुराना बेनूर मंदिर
दीवारों पे बारिश के बनाये नक़्शे
और यादें जो जगह जगह
कायी बनकर हरी हो आईं हैं ‘
एक पहचानी सी ख़ामोशी और
किसी के बुझते आलाव से उठता धुआँ
पेड़ों के झुरमुठों पे गहराते साये
और पिघलते काजल सी रात का कोना थामे
बादलों के बीच से गुज़रता हुआ चाँद का
एक टुकड़ा
पहले भी युहीं आया करते थे हम यहाँ
तब ये मंदिर आबाद था
सर्दी की गुदगुदाती हुयी धुप में
हम युहीं पेड़ों तले ख्वाब बुना करते थे
पुराने बरगद की जटाओं के तरह
वो भी उलझ कर रह गए हैं
तुम्हें भी याद होंगे वो पल
जब नरम धुप के बिछोने पर
सीप सी सर्द रातों में
जिस्म की लौ तापा करते थे हम
तेरे जाने से कुछ नहीं बदला
रात भी आयी है और चाँद भी
आज भी उस तपिश का दुशाला ओढ़े
इस बेनूर मंदिर के आँगन में
आगोश में तेरी यादों को लिए
युहीं जलता है जिस्म
सहर होने तक
और चुन चुन के स्याही से लिपटे सितारे
बन जाती हैं हर रात इक नयी नज़्म

 

 

Ek Adhuri Kahani


रात  अनगिनत  आँखों  से
देखती  रही
तेरे  गम  का  कारवां
अश्क  ओस  बन  टपकते  रहे  दरख्तों  से
और  दिल  की  दीवारों  पे
बनने  लगे  कुछ  भीगे  से  नक़्शे
यादों  की  हलकी   सी  धुंध
धीरे  धीरे  लिपटने  लगी
हर  ज़र्रे  से
और  उभरने  लगे  अल्फाज़
एक  पहचानी  सी  कहानी  के
अश्कों  से  सराबोर
अधूरे  से  इस  ख़त  के  टुकडे
शायद  तुम्हे  कहीं राहों में  मिलें
हवा  का  इक  तेज़  झोका
धोके  से  इसे
उड़ा  ले  गया  था
सूखे  पेड़ों  की  टहनियों  में  फस
तार  तार  हो  चुका  है  दामन  उसका
अनकहे  लफ्ज़  , कुछ  मिसरे
कुछ गीतों के  बोल
जो  गाये थे हमने कभी
कुछ  चाहतें  और
बहुत  कुछ
जो  तुमसे  जुड़ा  था
बिखर  सा   गया  है
रह  गयी  है  तो  बस
फिजाओं  में  एक
भीनी  सी  महक
गर्मी की पहली बारिश में नहाई
सौंधी  मिटटी  सी

[Image credit http://abstract.desktopnexus.com/wallpaper/110270/ ]

Dor


एक धागा है

एक नाज़ुक रेशमी डोर

जो मुझको ज़िन्दगी से बांधे है

वक़्त के साथ मैंने जाना कि

उसका एक नाम भी है


– माँ

A poem for Aman Ki Asha, Indo-Pak Peace Initiative


Gulzar Saheb writes

Aankhon ko visa nahi lagtaa
Sapno ki sarhad hoti nahin
Band aankhon se roz main sarhad paar chalaa jaata hun milne
‘Mehadi Hasan’ se!

My translation

you do not need visa for the eyes

there are no borders for the dreams

with closed eyes

everyday I cross the border

to meet Mehndi Hassan saheb

another one

nazar mein rehtey ho jab tum nazar nahin aatey
Yeh sur bulaatey hain jab tum idhar nahin aatey
In lakeeron ko zameen hi pe rehne do dilon pe mat utaro

My translation

even when you are in front of my eyes

you are not seen

when these notes call you do not come here

let these lines be on the surface of earth

don’t let them divide hearts

These excerpts are from the  poems which are part of Aman ki Asha, Indo-Pak peace initiative

After reading them something stirred inside me and  some words began to take shape in my heart.

For me Borders only exist as lines on some maps. I believe in One World and feel that we can make this planet a better place to live if we treat each other as humans and not Hindu, Muslim Christians or Indians, Pakistanis, Bangladeshis. The barbed fence that  has bruised the heart of the land can never divide the hearts .Our heartstrings will remain attached forever.

Here is my contribution to the great cause .


Dhak dhak dhadkta hai  dil uska bhi
Ragon mein surkh laal khoon daudta hai uski
Aankhon mein baste hain uski bhi hazaron sapne
Roz raat chhat par wo bhi sitaare gina karti hai
Aur subah sawere mongare ke bikhre phoolon ko
Mala mein piroti hai
Jab wo hansti hai khil uthta hai aangan mera
Jab roti hai to sarabor ho jaati hain
Mere gaon ki galiyan

Sanjh dhale wo bhi apni ammi ka aanchal thame

chajje se door tak phaile

sarson ke peeele phoolon ke pare
Tak-taki lagae dekhti hai
Aayine mein wo meri surat dekhti hai
Main use dekh muskarati hun
Kuch zyaada fark nahi hai hum dono mein
wo maathe pe mandir ka tika nahi lagati
Aur main
akshar bayein se dayein likhti hun
Sarhad ke uss paar
Meri ek saheli rehti hai

English traslation

Dhak Dhak beats her heart too

deep red blood flows in her veins too

a thousand dreams live in her eyes too

every night she too counts the stars

on the terrace of her home

and in the early morning

gathers the Mongra flowers

to weave them into a garland

when she laughs it fill my courtyard

when she cries the roads of  my village

get drenched

when evening falls she too holds her ammi’s shawl

she stands in the balcony with her mother

watching endlessly across the long stretch

of yellow mustard flowers

in the mirror she my face

an I smile at looking at her

there isn’t much difference between us

she does not apply the temple vermillion on her forehead

and I

write the alphabets from left to right

across the border

my friend lives


Triveni : the three line poems or Triplets


I am an admirer of Gulzar Saheb. He is my muse too. Triveni is unique poetry style developed by him. The trivenis are written with three misra’s (three lines of poetry) where first two lines forms a complete sher and the introduction of third misra(line) gives the sher a new dimension or meaning

Triveni examples of Gulzar

1

maa ne duaaye di thi…
ek chand si dulhan ki….

aaj footpath par laete hue… yeh chand mujhe roti nazar aata hai!

2

kantewali taar par kisne geele kapde tange hain

khoon tapkta hai qur naali me beh jata hai

kyun is fauji ke bewa har roz ye vardi dhoti hai

3.

aaise bikhre hain jaise raat din

motiyon wala haar toot gaya


tumne mujhe piro kar rakha tha

Here is my attempt of writing Triveni. I just call them three line poems, they do not follow the uniqueness of Gulzar Saheb’s work but still it is a first attempt towards a new verse form. These triplets do not have the same pattern as the Triveni of Gulzar.

1

Paani ki ek mauj
aayi aur chupke se baha le gayi
pyar ka ret gharaunda

2
beti ki kilkari
nadi ki satah par kuch bulbule
aur phir sab shant
3

Shaam ke surmayi adhere me
phighal raha hai dheere dheere
uska gum e tanhayi
4.

sharabor hain bageeche ki deeware
barish se ug aati hai kayi unpar
yaden hari ho gayi hain

5.
Kabhi yunhi jek jagah tham jata hai samay
jad pakad leta hai
darakhton ki tarah

6.
Thak kar ghar jate huye maan me ek sawal
kisko khilaun, kisko bhookha marun
aaj ki raat
7.

door vadi me khile hai
gul bahar ke phoor
jaise jal uththe hon lakho diye ek hi sath

8.
Syah raat
ghati se bansuri ki aawaz aur ek jalta diya
shayad koi premi hai
9.

ek ujda purana makan
gilehri, parinde, kutte
naye bashinde
10.

sookhe darakht
phir se dikha
wahi neela samandar

indivine post. vote here