एक शहर ये भी – कविता 9 – हाशिये में शहर


कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क के बेंच पर
उंघती ज़िन्दगी, बेपरवाह,बेख़ौफ़,
खोने के लिए उसके पास अब
यादें भी नहीं रही, हाशिये में रहने वालों की
ज़िन्दगी और मौत दोनों ही थोड़ी सस्ती होती हैं
आम ज़िंदगिओं में भला किसको दिलचस्पी
इन्हें  भूल जाने में ही सबकी भलाई है
ठीक उस बेउम्मीद समलैंगिक जोड़े के तरह
जो इंतज़ार में है एक क्रन्तिकारी बदलाव के
या वो कूड़ा बटोरता बचपन, ज़िन्दगी की महाभारत में
कर्ण के रथ की तरह फंसा – लाचार, अभिशप्त
या फिर फुटपाथ पे बैठे वो आंकड़े जो एक उम्र से
इस शहर में इंसान का दर्जा पाने की क़तार में हैं
या फिर पटरी पे बैठी वो अर्ध नग्न पगली
जो अपने बेतरतीब बालों सी उलझी
ज़िन्दगी की दुत्कार लिए ताकती रहती है
शहर के शोर भरे सन्नाटे को
या लाल बत्ती पर गाड़ियों की लम्बी क़तारों के बीच
हाथों में फूल, पेन और मैले चेहरों पर
दस रुपये की मुस्कान लिए दिन भर भागते छोटे छोटे पाँव
चलते रहना जिनकी मजबूरी है
या मैनहोल के ज़हरीले अंधेरों में दम तोड़ती
वो अदृश्य ज़िंदगियाँ जिनकी मौत किसी खाते में दर्ज नहीं होती
दिल्ली की चकाचोंध सतह को कुरेद कर देखो तो
शहर की बूढी हड्डियों में समाये सभी नए पुराने घाव
रिसने लगते हैं परत दर परत खून के जमे हुए थपके से काले
इन्हें न छेड़ना ही बेहतर है, हाशिये में बसा ये जुड़वाँ शहर बहुत भोंडा है
राजधानी की TRP घट जाती है फिर कोई झट से एक जादुई लेप पोत देता है
और दिल्ली फिर नयी गाड़ी सी चकाचक सरपट दौड़ने लगती है

3 thoughts on “एक शहर ये भी – कविता 9 – हाशिये में शहर

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