एक शहर ये भी – कविता 7 – रात आईना है …


 

रात आईना है इस शहर की बेख्वाब आँखों का
शाम ढले जब धुप का आखरी उजाला
पेड़ों की टहनियों में सिमट जाता हैं तो ये शहर
किसी पेंटिंग की तरह रहस्मयी हो जाता है
बची खुची रौशनी लैम्पोस्ट के नीचे
सिमट जाती है और समय अँधेरे कोनों
या भूले बिसरे हाशियों में छिप जाता है
सूखे ठूँठ सी खड़ी इमारतें अपननी थकी आखें
बंद किये अँधेरा ओढ़ अचेत सी सो जाती हैं
और फिर उभरने लगते हैं अक्स उस दिल्ली के
जो दिन में अपनी तन्हाई समेटे ताकती रहती है
टुकड़ों में बंटे एक अजनबी से आसमान को
शहर की इन बिखरी सड़कोंऔर सुनसान
चौराहों पे मैं भी इन्हीं अक्सों में ढूढ़ता हूँ अपना
खोया हुआ वो अक्स जो अपना सा तो है पर
है फिर भी बेगाना, ढिबरियों सी टिमटिमाती
रौशनी में आता है नज़र आता है स्लेटी खंडहरों के
खूँट पे टंगा तनहा सा इक शहर उतार फेंका था
कभी जिसे और आती है नज़र एक सांवली सी नदी
राह भूली बाँवरी सी, पेड़ तोड़ देते हैं क़तारें
स्याह सड़कों के किनारे, चहचहाते डोलते हैं
पंख सी बाहें पसारे, सप्तपर्णी सी महक
उठती है हवा, रात में ही सांस लेता है शहर
थकन की चादर बिछा कर, फ़िक्र ज़माने की छोड़
है कोई सो रहा वो देखो चाँदनी को ओढ़
कुछ ख्वाब औंधे हैं पड़े उस पुराने बरगद परे
गीत कोई गा रहा है याद के पनघट ख़ड़े
सड़क किनारे बैठ पी रहा है कोई ख्वाबों की चिलम,
उठ रहा है धुआं सुलगते आलाव से कहीं
लिए सोंधी सी महक एक गुज़ारे वक़्त की
दिन की दमकती जिल्द में क़ैद सफहों से
झांकते हैं सूखे हुए लम्हे, कुछ भूले हुए
रुकए और मिटटी के सकोरों सी बिखरी
हुयी कुछ यादें, रात आईना है उन्हीं तवारीख़
के टुकड़ों का, तुम भी कभी खाँचो में बंटे उजालों से निकल
थाम लेना स्याह सा कोई इक छोर और फिर मिलना
उस दिल्ली से जो कभी हमारी थी

 

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