एक शहर ये भी – कविता 6 – दिल्ली ६


आज युहीं पुरानी दिल्ली की उन जानी अनजानी
तंग गलियों में लौट जाने का मन हुआ
गलियां ऐसी की लखनऊ की भुलभुलैया
फीकी पड़ जाये, चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन
से उतर हम भी हो लिए लोगों के उमड़ते
हुजूम के साथ, नयी दिल्ली का नक्शा
चाहे बदल गया हो यहाँ कुछ नहीं बदला
नूर से नहायी सहरी की सुबहें, इफ्तार
की पाकीज़ा शामें और जामा मस्जिद की
सीढ़ियों पे रेकॉर्डतोड़ गर्मी से बेपरवाह,
बेफ़िक़्र खेलते नन्हे रोज़दार जिन्हें
इंतज़ार है तो बसआने वाली ईद का
आसमां पे वही ढलते सूरज की लाली,
शाम ए इफ्तार की रंगत में सराबोर
बाज़ार, ख़ुशी से दमकते चेहरे,
मस्जिद से आती आज़ान की गूँज
दरगाह हज़रत सरमद शहीद
की जाली से बंधे लाल धागे में
लिपटी एक बाली और इबादत
की रौशनी से गुलज़ार मेरा मन
आज भी उर्दू बाज़ार से मटिआ महल
और चितली क़बर से हवेली आज़म खान
तक सिवइयों की खुशबू से महकती दुकानें
याद दिलाती हैं दोस्तों की वो अड्डेबाज़ी,
वो लौंग चुरी कबाब और कालना स्वीट्स
की पनीर जलेबी, वो लज़ीज़ निहारी कुलचे,
हाजी मोहम्मद अनवर की मिर्च मसाला बिरयानी,
कूल पॉइंट का शाही टुकड़ाऔर नवाब कुरैशी
का प्यार मोहब्बत मज़ा, वो तुम्हारा नज़रें बचा
फतेहपुरी मस्जिद से निकलना और तुम्हारे
इत्र की खुशबु से मेरी सांसों का महक जाना
मेरा तुम्हें चुपके से बालियाँ थमाना ओर
इसी बहाने तुम्हारे नाज़ुक हाथों का
छू जाना, गुड़ के शरबत सी मीठी
तुम्हारी हंसी, चूड़ियों की वो खनखनाहट
और चाट के तीखे मीठे सकोरों के बीच
कभी यूँही शरमा कर तुम्हारा मेरी बांहों में सिमट जाना
और ऐन मौके पर अशरफ चचा का बिज़ी हो जाना
जुगनुओं सी चमकती रात में जब हम आखिर जुदा होते
तो चचा अक्सर पैसे लेना भूल जाते, तुम नक़ाब ओढ़ना
और मैं घर का रस्ता भूल जाता
अब न तुम हो न फुर्सत के वो दिन रात है
और न ही वो दोस्त और न ही चचा जान
पर आज भी मैं शाहजानाबाद की इन रंगीनियों में
खिंचा चला आता हूँऔर यादों की मश्क़
कंधे पे उठाये यूँही हर नुक्कड़,
हर दर ओ दरवाज़े, हर झरोखे में

बस तुम्हें ढूढ़ता हूँ

इस कविता के बारे में कुछ कहना चाहूंगी | जयश्री शुक्ला से हमारी जानपहचान फेसबुक से हुई और ठोस ही समय में हम अच्छे दोस्त बन गए | जयश्री लाजवाब तस्वीरें खींचती हैं जो दिल्ली के हर रूप हर देखे अनदेखे पहलु से हमें रूबरू कराती हैं | आप उन्हें इंस्टाग्राम पर फॉलो कर सकते हैं. रमज़ान के इस पाक महीने में उनकी तस्वीरें देख मन उन्ही शाहजहानाबाद के गली कूचों में खो गया और कुछ यादें ताज़ा हो गयीं | कुछ फेर बदल कर इस कविता में हमने उन्हें ही संजोया है | इस इंस्पिरेशन के लिए जयश्री का तहे दिल से शुक्रिया |
अमिताभ मित्रा भी ऐसे ही हमारे एक कवी दोस्त हैं. पेशे से डॉक्टर हैं पर क्या खूब पेंटिंग करते हैं| कभी रंगों से तो कभी शब्दों से | कविता की दो लाइनें उनके एक अंग्रेजी कविता से प्रेरित हैं. तो उनका भी बहुत शुक्रिया |
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