Arun ye madhumay desh hamara … Favorite Hindi Poets 1


I wanted to do this post for a long time but choosing some poets from the wealth of Hindi Poetry was an uphill task. Each poets has a special place in my heart, each poem touches some deeper chord. The reason for this journey is to relive the glorious history of hindi poetry. I will be doing a series of post to accomodate some of my favorite poets and their poems.

I am posting some poems of Jaishankar Prasad, Ramdhari Singh ‘Dinkar’ and Sumitra Nandan Pant in this post.

In Aadi Kal and Bhakti kal the language for poetry writing was mainly Braj and Awadhi apart from sanskrit. It was only in the 19th century that Khadi boli came to become the accepted language for poetry writing. Mahavir Prasad Drivedi, Maithili Sharan Gupt who were the forebearers of Khadi boli ( today’s Hindi) and wrote beautiful verses and established the new trend modern Hindi language.

Then came the Golden Era with a bouquet of memorable poetry from Jai Shankar Prasad, Mahadevi Varma, Suryakant Tripathi ‘ Nirala ‘ and Sumitra Nandan Pant. Each of them inspired me in one way or the other. Jai Shankar Prasad remains my all time favorite. ‘Kamayani‘ my most loved poem. There is something in his poetry that draws you and holds you for a long time. This maha Kvya or allegorical epic poem is one of the finest in Hindi literature. It has beautiful interplay of human emotions, thoughts, and actions.

Here is an excerpt from the verse

Chinta 1

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर,

बैठ शिला की शीतल छाँह

एक पुरुष, भीगे नयनों से

देख रहा था प्रलय प्रवाह |

नीचे जल था ऊपर हिम था,

एक तरल था एक सघन,

एक तत्व की ही प्रधानता

कहो उसे जड़ या चेतन |


Lajja part 1

नयनों की नीलम की घाटी

जिस रस घन से छा जाती हो,

वह कौंध कि जिससे अंतर की

शीतलता ठंडक पाती हो,

हिल्लोल भरा हो ऋतुपति का

गोधूली की सी ममता हो,

जागरण प्रात-सा हँसता हो

जिसमें मध्याह्न निखरता हो,

हो चकित निकल आई

सहसा जो अपने प्राची के घर से,

उस नवल चंद्रिका-से बिछले जो

मानस की लहरों पर-से

I wish I could do the traslation here , may be I will in some other post.

Another poem of Prasad which is worth mentioning is अरुण यह मधुमय देश हमारा . I always loved this particular poem of his. It is a very inspirational poem and gives me goose pimples. Enjoy ..

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा॥
सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कंकुम सारा॥
लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किये, समझ नीड़ निज प्यारा॥
बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनन्त की, पाकर जहाँ किनारा॥
हेम कुम्भ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मंदिर ऊँघते रहते जब, जगकर रजनी भर तारा॥


Raat Yo Kahne Laga Mujse Gagan ka Chaand by Dinkar
is my favorite poem. He was a rebellious poet and mostly wrote in Veer Rs ( Brave mode) but this is a beautiful verse which I would love to share

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव है ।
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते ।
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है ।
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी,
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ ।
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ।
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे ।
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।

Sumitra Nandan Pant was my favorite during my teenage days. I loved the way his poetry flowed like a young river and made me smile each time I read it. Vasant is a lovely poem and I hope all of you will enjoy it .

चंचल पग दीपशिखा के धर
गृह, मग़, वन में आया वसंत
सुलगा फागुन का सूनापन
सौन्दर्य शिखाओं में अनंत

सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर उर में मधुर दाह
आया वसंत, भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह

पल्लव पल्लव में नवल रूधिर
पत्रों में मांसल रंग खिला
आया नीली पीली लौ से
पुष्पों के चित्रित दीप जला

अधरों की लाली से चुपके
कोमल गुलाब से गाल लजा
आया पंखड़ियों को काले-
पीले धब्बों से सहज सजा

कलि के पलकों में मिलन स्वप्न
अलि के अंतर में प्रणय गान
लेकर आया प्रेमी वसंत
आकुल जड़-चेतन स्नेह प्राण

I am thankful to Kavita Kosh and Prayogshala from where I got to read and copy the poems.

4 thoughts on “Arun ye madhumay desh hamara … Favorite Hindi Poets 1

  1. Amazing post… I love these poets too… as a matter of fact did a Quiz on Hindi poets on my blog and what a coincidence u post about the same people.

    And also I did a small thing with Ramdhari Singh Dinkar’s work who I admire a lot for rashmirathi.

    http://prats.co.in/shakti-aur-kshama/

    I loved your poem Prats. It is wonderful to know that there are still people who have not given up reading and enjoying Hindi Poetry. I saw your quiz too and commented on Shakti and Shama .. great work. Thank you visiting .Keep following

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  2. Apologies for the intrusion, but couldn’t resist posting one of my favorite poems here. This one is known as ‘ghat’ (earthen pot) and was written by Sumitra nandan Pant. I hope you would like it for sure, typical chhayavaad 🙂

    कुटिल कंकडों की कर्कश रज,
    घिस घिस कर सारे तन में,
    किस निर्मम निर्दयी ने मुझको,
    बाँधा है इस बंधन में।

    फांसी सी है पड़ी गले में,
    नीचे गिरता जाता हूँ,
    बार बार इस महाकूप में,
    इधर उधर टकराता हूँ।

    ऊपर नीचे तम ही तम है,
    बंधन है अवलम्ब यहाँ,
    ये भी नहीं समझ में आता,
    गिरकर मैं जा रहा कहाँ।

    काँप रहा हूँ विवश करूँ क्या,
    नहीं दीखता एक उपाए,
    ये क्या ये तो श्याम नीर है,
    डूबा अब डूबा मैं हाय।

    चला जा रहा हूँ ऊपर अब,
    परिपूरित गौरव लेकर,
    क्या उऋण हो सकूँगा मैं,
    ये नवजीवन भी देकर?
    — सुमित्रानंदन पन्त

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