Phir Intezar


आज फिर शाख से सुनहरे पत्तों को
ज़मीं पर बरसते देखा
फिर तेरी याद के साये में
एक दिन को गुज़रते देखा
हवाओं की सरसराहट में सुनी फिर
तेरे गीतों की धुन

और फिर शाम के गहराते सायों में
गम की एक बद्ली सी उठी
आज फिर तेरे प्यार की तुषार से
भीगा मेरा मन्

पिघलते आसमा के स्पर्श से
मचल उठ्ठी जब सागर की लहरें
कुछ मेरे दिल में भी बीती हुई
रुपहली रंगीं रातों का तूफान उठा

फ़िज़ाओं में ऐ चाँद
तू क्यूँ है आज इतना गमगीन
सितारों की इस भीड़ में
क्या तू भी है मेरी तरह तनहा
क्यूँ आज तेरी चांदनी में
गम की नमी सी है
आज फिर यूँही नहाकर
तेरे अश्कों के समन्दर में
सोचती हूँ कि होगा क्या ये इन्तेज़ार ख़त्म
या फिर ऐ चाँद तेरी ही तरह
मुझको भी इक तन्हा मुसाफिर बनके
प्यार की राहों में युहीं दिन रात
भटकना होगा

indivine post. please vote

8 thoughts on “Phir Intezar

  1. my 2 cents:

    इस इन्तेज़ार में एक अजीब सा मज़ा है
    शायद यह तेरे प्यार का नशा है
    दीदार की जरूरत उन्हें है होती
    जिनके दिल में दिलदार की तस्वीर नहीं होती

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  2. Tikuli, this is gorgeous beyond words. Can I repost this? On facebook as well as my blog. Giving you the credit of course!!
    Thanks everyone esp Ekta .. do feel free to re post . 🙂 honor for me

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