Intezar


 

फीर हुईं अश्क से नम् आँखें मेरी
फीर उठा दर्द आज सीने में
फीर तेरी याद सीने से लगाये
ढूढ़ते रहे हम तुझे शाम के
बेनूर अंधेरों में

तनहा थी मैं जब तक
तुम ना मीलेे थे
फीर तुम मिले , गम मीले ,
और इक कारवां सा बन गया

ओस से भीगी है रात कि अश्कों से
कर रहें हैं हम इन्तेज़ार बरसों से
सी लियें है लब तुने क्या जाने हम
वजह क्या है
इतनी ऊँची हैं दीवारें जो तुमने
बनायीं है हमारे बीच
वर्ना जान लेते थे हम सबब उदासी का
सिर्फ नज़रों से

बढालो फासले , मौन की ओढ़ लो चादर
बंद करदो सारे ज़रिये , सारे रस्ते
जो तुम तक पहुँचते हैं
मगर तुम देखना मेरी जां
तुम जिंतना दूर जाओगे
उनते ही करीब आओगे

ना जी सकोगे तुम ये हमें है पता
कर लो सारे जतन मुझे मालूम है
गर है मेरी मोहब्बत मी दम
एक दिन तुम लौट के ज़रूर आओगे

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3 thoughts on “Intezar

  1. dard chalak raha hain har labz main…
    aansoo tapak raha hain aankhose,
    aur kaise bayan kare aap ki iss kavita ke,
    alfaaz dhoodh rahe hain taarif ke…

    Like

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