Lamhe..subah aur dopahar


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भोर

कुछ आधे अधूरे ख्वाब
अपनी अलसाई आँखों मी समेटे
सूरज की पहली किरणों की चादर ओढे हुए
बिस्तर की सिलवटों में है
एक जिस्म करवटें ले रहा
तकिये पे शाम के बादलों के साए हैं
लिपटे हुए
नर्म गुलाबी होंठ जैसे ओस से भीगे गुलाब
और गालों पे लालिमा भोर के आकाश सी
हाथों की उँगलियाँ थामे है
डोर रेशमी प्रेम की
और पैरों में झनक
उठते हैं सैकडों स्वर,
जब शरमाकर वो तलवे
आपस में हैं मिलते इठलाकर
लेकर अंगडाई उतरती है ज़मी पर
फिर तुम्हरी मृण्मयी
मिलन की आस दामन में छुपाये


दोपहर

हो चली दोपहरी
अब भी बुन रही है ख्वाब हो
है आस अब भी कि
आएगा कोई संदेसा
पूछती है खुद से
आखीर उनका ये प्रेम है कैसा
उँगलियों में उलझी लटों को
बांधती, विरह से नम
झील सी आँखों से है ताकती
एक चुप्पी सी है शाखों पे
परिंदे खामोश हैं
थम गयी है हवा
थम सा गया है सब जहाँ
पर कहीं भीतर है उठने वाला
इक तूफां
बहुत उमस है,
शायद अब बरसेगा आसमां
लेके आयेंगीं घटायें
मन् में छिपे दुख का सावन
बहुत बरसेंगे ये नयन
लगता शाम ढले

शाम ढल रही है अब देखें क्या होता है ..रात युही गुज़रती है या कोई खबर आती है

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9 thoughts on “Lamhe..subah aur dopahar

  1. ye dono hi kavitaayein hamein bahut achchi lagi.

    khaaskar ki shaam ka takiye pe milna… bahut hi khuubsurat metaphors ka prayog kiya hai.
    duuji kavita ka ant hamein kuch Tagore ki yaad dila gaya.

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  2. Pingback: Tikuli Dogra interviewed. Indian Woman Blogger blogs at 'Spinning a yarn of life'.

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