qatran- e – Ishq


बन कर घटा यूँ आसमा पर
आखों का काजल छा गया
आज जो बरसे नयन तो
भीगे का सारा आलम साथ में |

खुली जो आँख तो हर हसरत
उठी जाग मन् की
मगर अफ़सोस खो दिया उसको भी
पाया था जिसको ख्वाब में |

दिन भर गुज़र गया
खुद के टुकड़े चुनते हुए
चली जो शाम – ए – गम की हवा
फिर से बिखर कर रह गई मैं |

वो इक पल प्यार की खुशबु
ना रख सके महफूज़
हम उनके हाथ में ज़िन्दगी
कैसे थमा देते ए दोस्त |

तुम बिछडे कुछ इस तरह से मेरे महबूब
के ज़िन्दगी की रुत ही बदल गई
एक तेरे जाने ने सारे
गुलशन को वीरां कर दिया |

तेरी हर निगाह पर बांध जाती हैं
हजारों उम्मीदें मेरी
यूँ इस तरह प्यार से हमदम मेरे मुझे
देखा ना कर |

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