Ek Adhuri Kahani


रात  अनगिनत  आँखों  से
देखती  रही
तेरे  गम  का  कारवां
अश्क  ओस  बन  टपकते  रहे  दरख्तों  से
और  दिल  की  दीवारों  पे
बनने  लगे  कुछ  भीगे  से  नक़्शे
यादों  की  हलकी   सी  धुंध
धीरे  धीरे  लिपटने  लगी
हर  ज़र्रे  से
और  उभरने  लगे  अल्फाज़
एक  पहचानी  सी  कहानी  के
अश्कों  से  सराबोर
अधूरे  से  इस  ख़त  के  टुकडे
शायद  तुम्हे  कहीं राहों में  मिलें
हवा  का  इक  तेज़  झोका
धोके  से  इसे
उड़ा  ले  गया  था
सूखे  पेड़ों  की  टहनियों  में  फस
तार  तार  हो  चुका  है  दामन  उसका
अनकहे  लफ्ज़  , कुछ  मिसरे
कुछ गीतों के  बोल
जो  गाये थे हमने कभी
कुछ  चाहतें  और
बहुत  कुछ
जो  तुमसे  जुड़ा  था
बिखर  सा   गया  है
रह  गयी  है  तो  बस
फिजाओं  में  एक
भीनी  सी  महक
गर्मी की पहली बारिश में नहाई
सौंधी  मिटटी  सी

[Image credit http://abstract.desktopnexus.com/wallpaper/110270/ ]

Chaand : Ek Kavita


Yesterday was full moon night and I could not resist capturing the glorious moon in my camera. I think I am in love again with the moon. Composed these few lines as I stood bathed in its lucid moonbeams.

Aaj yun lagata hai mano

pighal raha hai chand aasman me

chalak rahi hai chandni

har shakh, har zarre, har qatare  se,

khamosh hai raat

Bheega sa hai  aalam sara

aur kuch bheega sa hai

mann bhi mera

Suno,

kuch gunguna rahi hai chandni

hawaon me kuch sangeet sa hai

tham gayi hai

kuch pal ke liye ye raat

chupse se ghutno ke bal chal kar

chaad aaj  intne qareeb aaya hai

ek tashtari

maine bhi rakh de hai

apne dil ke  aangan me

kuch tere pyar ki boonden

Tapak  kar  gir jayen shayad

aur mil jaye meri

beqarar pyasi  rooh ko

shayd kuch sakoon

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wo..


वो सराब था के हकीकत
मालूम नहीं
मेरा जुनून था या के कोई ख्वाब
मालूम नहीं

सेहरा की तपती रेत पर थे
उसके क़दमों के निशां
और फलक पर आंच थी उसकी
एक खुशबू सी हवा में थी
दिल में एक याद थी उसकी

अश्कों की तरह बह निकली थी रेत
उठ्ठा दर्द का था एक गुबार
पाँव अंगार हुए थे फिर भी
उसके दीदार का था इन्तेज़ार

दश्त दर दश्त सफ़र करके
आ पहुचे थे उस तक
और फिर ओझल हुआ
आखों से तसव्वुर उसका

है उम्मीद के बरसेगा कोई अब्र
लिए उसकी चाहत की भीनी सी फुहार
और कर जायेगा मुझे
उसके इश्क की बारिश से
फिर इक बार सराबोर
और दे जायेगा यकीन
उसके होने का

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Aao phir kuch pyar ki baat Karen


आओ फिर कुछ प्यार की बात करें
वो प्यार जो कभी
मेरे और तुम्हारे बीच था
उन् बारिश से भीगी हुई
शामों का ज़िक्र करें

या फिर उन् तारों भरी रातों का
उन् सपनो का जो हमने
मिलकर थे बुने
या फिर डूबते सूरज से
रंगीन शामों का

और वो प्रेम की रातों में
जुगनुओं का चमकना याद करें

आओ बात करें उन चाहतों की,
उन् ख्वाहिशों की
उन् सर्द रातों की
जो तुम्हारी तपिश से
गरमा उठ्ठी थी

जब रुई से बर्फ के टुकडों
के साथ पंख लगा
हमारे मन् युहीं दूर
कहीं उड़ जाते थे

आओ बात करें
तुम्हारी उन् नटखट नशीली आँखों की
भीगे हुए सुर्ख हसीं लबों की
या फिर कानों में दबी सि आवाज़ में
तुम्हारी प्यार भरी बातों की

और हजारो दीपकों सी जगमाती
हसरतों की जिनकी रंगत से
तेरे गालो पे आ जाती थी लाली

उन् दहकते जिंसों की
उन् महकती रातों की
जो तेरे आगोश में
गुज़रीं थी कभी

आज उन् बिखरी हुई यादों के
मलबे में से
तुम्हारे कुछ ख्वाब
निकल के आयें हैं
आज फिर मुझको
दो घड़ी
तुम्हारी आगोश में
समाने का लुफ्त मिला है.

Lamhe..subah aur dopahar


Picture 193

भोर

कुछ आधे अधूरे ख्वाब
अपनी अलसाई आँखों मी समेटे
सूरज की पहली किरणों की चादर ओढे हुए
बिस्तर की सिलवटों में है
एक जिस्म करवटें ले रहा
तकिये पे शाम के बादलों के साए हैं
लिपटे हुए
नर्म गुलाबी होंठ जैसे ओस से भीगे गुलाब
और गालों पे लालिमा भोर के आकाश सी
हाथों की उँगलियाँ थामे है
डोर रेशमी प्रेम की
और पैरों में झनक
उठते हैं सैकडों स्वर,
जब शरमाकर वो तलवे
आपस में हैं मिलते इठलाकर
लेकर अंगडाई उतरती है ज़मी पर
फिर तुम्हरी मृण्मयी
मिलन की आस दामन में छुपाये


दोपहर

हो चली दोपहरी
अब भी बुन रही है ख्वाब हो
है आस अब भी कि
आएगा कोई संदेसा
पूछती है खुद से
आखीर उनका ये प्रेम है कैसा
उँगलियों में उलझी लटों को
बांधती, विरह से नम
झील सी आँखों से है ताकती
एक चुप्पी सी है शाखों पे
परिंदे खामोश हैं
थम गयी है हवा
थम सा गया है सब जहाँ
पर कहीं भीतर है उठने वाला
इक तूफां
बहुत उमस है,
शायद अब बरसेगा आसमां
लेके आयेंगीं घटायें
मन् में छिपे दुख का सावन
बहुत बरसेंगे ये नयन
लगता शाम ढले

शाम ढल रही है अब देखें क्या होता है ..रात युही गुज़रती है या कोई खबर आती है